मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से प्रवर्तन निदेशालय (ED) को फटकार मिली है. दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने IO पंकज कुमार को नोटिस जारी कर यह बताने के लिए कहा है कि उनके खिलाफ दोषपूर्ण जांच के लिए अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश क्यों न की जाए.
आदेश विशेष PMLA कोर्ट के जज मोहम्मद फारुख ने दिया. उन्होंने कहा कि इस जांच में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि कुछ लोग बच जाएं. अदालत का मानना है कि चूक जानबूझकर की गई, ताकी दोषी शख्स छूट जाए. अदालत ने कहा कि ईडी के लिए यह आत्मनिरीक्षण करने का अवसर है कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाना चाहिए.
दो आरोपी दोषी, दो को किया मुक्त
दरअसल, अदालत सीबीआई की शिकायत के आधार पर 4 आरोपियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले पर विचार कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने चेक बनाने और जालसाजी की साजिश रची थी. कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ईडी ने साबित कर दिया है कि 2 आरोपियों ने मनी-लॉन्ड्रिंग का अपराध किया है. वहीं, दो अन्य आरोपियों के खिलाफ सबूत पेश करने में ईडी फेल हो गई, जिसके कारण दोनों रिहा हो गए.
ED की जांच पर कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि IO पंकज कुमार वर्तमान मामले में निष्पक्ष और उचित जांच करने में विफल रहे हैं. दो व्यक्तियों के खिलाफ जांच के दौरान अभियोजन के लायक सामग्री रिकार्ड में आने के बावजूद उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया. अदालत के मुताबिक, IO ने एक आरोपी के बैंक खातों की जांच नहीं की. संबंधित संचालकों की जांच न करने से जांच को गलत दिशा देने के लिए जानबूझकर शरारत करने के साथ-साथ भौतिक सबूतों को छुपाने की बू आती है. न्यायालय ने इसे दोषपूर्ण जांच का एक स्पष्ट मामला बताया है. ईडी ने आगे कहा कि जांच यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि कुछ व्यक्ति निर्दोष बच सकें.
दोषमुक्त हो गए दोषी व्यक्ति
कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित हो गया है कि IO पंकज कुमार ने प्रथम दृष्टया गलतियां की हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनुचित या दोषपूर्ण जांच हुई. इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, क्योंकि दोषी व्यक्ति दोषमुक्त हो गए. जांच अधिकारी की चूक और कृत्य जानबूझकर इरादतन थे और परिहार्य परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुए थे.
जांच पूरी करने में 10 साल की देरी
अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने में अत्यधिक देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है. जांच एजेंसियों से यह अपेक्षा की जाती है कि जांच अनावश्यक देरी के बिना पूरी की जाए, ताकि लंबी जांच के दौरान सबूत नष्ट न हों. कोर्ट ने कहा
अदालत ने कहा कि यह बताने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं है कि किन परिस्थितियों में जांच पूरी होने में लगभग 9 से 10 साल लग गए.
देरी और खामियों पर उठाए सवाल
जांच को दोषपूर्ण बताते हुए अदालत ने कहा कि जांच में देरी और खामियों की परिस्थितियों और कारणों को देखना और इस तरह की सुस्ती के लिए जिम्मेदार संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना डीओई के सक्षम प्राधिकारी का काम है.