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निकाय चुनाव रिजल्ट: तो क्या इस बार बदलेगा सहारनपुर का इतिहास?

2012 के चुनावी नतीजों को देखा जाए तो बेहद दिलचस्प नजर आते हैं. यहां नगर पालिका और नगर पंचायत सीटों पर ऐसी पार्टी के उम्मदीवारों का परचम लहराया था, जो यूपी की राजनीति में बहुत ही कम दखल रखती है.

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पश्चिमी यूपी का सहारनपुर अक्सर फसाद की जद में रहता है. राजनीतिक दृष्टि से भी यह इलाका काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में नगर निकाय चुनाव के मद्देनजर इस सीट पर भी सबकी नजर है.

इससे भी बड़ी बात ये है कि सहारनपुर सीट पर पहली बार महापौर पद के लिए चुनाव हुआ है. इस बार परिसीमन के बाद ये नगर निगम बना है. सहारनपुर जनपद में नगर निगम की 1, नगर पालिका की 4 और नगर पंचायत की 6 सीटों पर आज नतीजे आने हैं. 

2012 के चुनावी नतीजों को देखा जाए तो बेहद दिलचस्प नजर आते हैं. यहां नगर पालिका और नगर पंचायत सीटों पर ऐसी पार्टी के उम्मदीवारों ने परचम लहराया था, जो यूपी की राजनीति में बहुत ही कम दखल रखती है.

सहारनपुर में रहा एनसीपी का दबदबा

सहारनपुर की चार नगर पालिका परिषद में से दो सीटें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जीती थीं. नकुड़ और गंगोह नगर पालिका परिषद सीट से एनसीपी के उम्मीदवार धनीराम और नौमान मसूद ने बाजी मारी थी. जबकि देवबंद नगर पालिका सीट से माविया अली ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की थी. वहीं सरसावा सीट से भी निर्दलीय उम्मीदवार नफीसा ने परचम लहराया था.

वहीं नगर पंचायत की बात की जाए, तो जिले की 6 नगर पंचायतों में चार सीटों पर एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी. अम्बौहटा पीर, नानौता, सुल्तानपुर चिलकाना और बेहट नगर पंचायत से एनसीपी के उम्मीदवार जीते थे. जबकि बाकी दो नगर पंचायत सीटों पर दो महिलाओं शिमला देवी और पूनम ने निर्दलीय कैंडिडेट के तौर पर मैदान मारा था.

सहारनपुर नगर निगम सीट पर कड़ी टक्कर

पहली बार सहारनपुर सीट पर महापौर पद के लिए चुनाव हुए हैं. यहां मेयर पद के लिए 12 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं. जबकि 667 पार्षद प्रत्याशी हैं. यहां तीसरे चरण के तहत 29 नवंबर को मतदान हुआ था. बहुजन समाज पार्टी पहली बार अपने टिकट पर चुनाव लड़ा रही है और सहारनपुर सीट पर पार्टी के उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान हैं, जबकि उनका सीधा मुकाबला बीजेपी के संजीव वालिया से है. शुरुआती नतीजों में दोनों के बीच करीबी टक्कर देखने को मिली है.

सहारनपुर में इसी साल दलित और राजपूतों के बीच संघर्ष हुआ और कुछ दलितों ने हिंसा के खिलाफ नाराजगी जताते हुए बौद्ध धर्म भी अपना लिया था. तमाम विवादों के बीच यह निकाय चुनाव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. वहीं इस चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती की किस्मत का भी फैसला होगा.

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