देश के सबसे बड़े चुनावी महासमर में अपनी खास अहमियत रखने वाले उत्तर प्रदेश में चुनावी दंगल इस बार दिलचस्प होने के आसार नजर आ रहे हैं. प्रदेश में चुनावी दंगल जीतने के लिए दो बड़े राष्ट्रीय दल गुजराती दांव-पेंच का सहारा लेते नजर आएंगे तो वहीं अन्य दल अपनी चुनावी धार को पैना बनाने में जुटे हुए हैं.
उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन में गुजराती दांव पेंचों से लड़ाई लड़ने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस ने जहां चुनावी वर्जिश शुरू कर दी है, वहीं इस चुनावी रण में अपने को आगे रखने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी जोर आजमाने जुटी हुई हैं.
संयुक्त प्रगतिशली गठबंधन (संप्रग)-वन और संप्रग-टू के बाद कांग्रेस संप्रग-थ्री सरकार बनाकर हैट्रिक बनाने में जुटी है. पार्टी की तमाम अंदरूनी सियासत के बावजूद नरेन्द्र मोदी को आगे करने वाली भाजपा भी जानती है कि इस बार भी अगर वह संप्रग सरकार की तमाम खामियों को भुना नहीं पाई तो फिर केंद्र की सत्ता में वापस लौटना उसके लिए सपने जैसा होगा.
यही वजह है कि पीएम इन वेटिंग रह चुके भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की भी परवाह नहीं करते हुए नरेन्द्र मोदी को तुरूप के इक्के की तरह पेश किया जा रहा है. नरेन्द्र मोदी के लिए भी यह अग्निपरीक्षा की घड़ी होगी. इसके लिए उनके सबसे खास सिपहसालार अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर यहां के माहौल को मोदीमय बनाने का प्रयास किया है. शाह के दांवपेंचों का तोड़ निकालने के लिए कांग्रेस ने गुजरात के ही मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है.
देश में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश में है. राज्य में भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही स्थिति डवांडोल है. वर्ष 2009 में यूपी में धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने भाजपा के सपने तोड़ दिए थे, लेकिन पार्टी यह भी जानती है कि इस बार उसकी राह बेहद कठिन है. संगठन के लिहाज से पार्टी अभी भी पुरानी हालत में है.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह स्वयं इसी राज्य से हैं. इसके बाद भी पार्टी का कायाकल्प करने में नाकाम रहे हैं. यूपी विधानसभा चुनाव में भी राजनाथ सिंह सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन जब नतीजे सामने आए तो सभी केवल आत्मविश्लेषण और हार की वजह पता लगाने की बात ही कहकर पल्ला झाड़ते रहे.
अब राजनाथ ने शाह दांव खेलकर कुछ नया करने की सोची है. लेकिन गुजरात की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोदी का जादू बरकरार रखना शाह के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस का भरोसा जीतने वाले मधुसुधन मिस्त्री के लिए भी प्रदेश में चुनौतियां कम नहीं हैं.