पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिमी प्रांत फाटा. पहाड़ों वाले इस इलाके में दर्रों से ही पहुंचा जा सकता है. फिर जितनी आबादी मिलती है सब अलग-अलग कबीले में बंटी हुई. हरेक के अपने रिवाज, अपनी रवायतें. जीने का अंदाज अलग, लेकिन हुकूमत किसी की नहीं. कम से कम पाकिस्तान सरकार की तो बिल्कुल नहीं. कबीलों की कलह से किनारा करने के लिए पाकिस्तान ने इस इलाके को केंद्र शासित घोषित कर छोड़ ही दिया था.
लेकिन इस इलाके की तस्वीर बदली 9/11 के बाद. अफगानिस्तान में अमेरिकी हमला हुआ तो तालिबान ने भागकर यहां के पहाड़ों में पनाह ली. अमेरिका ने कार्रवाई का दबाव बनाया तो 2002 में आजादी के बाद पहली बार पाकिस्तानी सेना इस इलाके में दाखिल हुई. कबीलों को यह भरोसा दिलाते हुए कि वह यहां विकास के लिए फंड देगी. ऐसा तो कुछ हुआ नहीं, उल्टे सेना ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया. कबीलों का भरोसा टूटा और वे पाकिस्तानी सेना के खिलाफ हो गए और शुरुआत हुई एक नए संघर्ष की.
फाटा में खैबर, मोहमंद, ओरकजई, कुर्रम जैसे कई इलाके हैं लेकिन कबीलों के मान से सबसे ताकतवर है वजीरिस्तान (उत्तरी और दक्षिणी). पाकिस्तानी सेना से लड़ने के लिए न सिर्फ तालिबान और अलकायदा नहीं, बल्कि पाक आर्मी के पूर्व अफसरों ने भी यहां के बाशिंदों की मदद की. और इस तरह वजीरिस्तान बन गया आतंकी संगठनों की नई नर्सरी. जिसकी सबसे खूंखार पैदावार है तहरीक-ए-तालिबान.
इस इलाके से हमारा जुड़ाव खान अब्दुल गफ्फार खान (सरहदी गांधी) से है. महात्मा गांधी के नजदीकी लोगों में से एक. यहां के बाशिंदे आमतौर पर शांतिप्रिय रहे, लेकिन सियासत, पाकिस्तानी फौज और आतंकवाद ने इन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक लोगों में शुमार कर दिया है. कहानियों में काबूलीवाला जिस रास्ते से आता था, उसी रास्ते में पड़ने वाला वजीरिस्तान दस साल से जंग झेल रहा है. पाकिस्तान में कहीं भी हमला हो, यहां बेतहाशा बमबारी हो जाती है. पाकिस्तान का वित्त मंत्रालय इस लड़ाई पर 30 बिलियन डॉलर (करीब 2 लाख करोड़ रु.) का खर्च बता चुका है. हां, इसमें फिदाइन और अन्य हमलों में मारे जाने वाले मासूमों की जान की कीमत शामिल नहीं है.