एक ओर उत्तर प्रदेश का सरकारी अमला सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्कूल चलो अभियान चला रहा है, रैलियां निकाली जा हैं, तो वहीं दूसरी ओर सूचना के अधिकार से हुआ खुलासा इन अभियानों की पोल खोल रहा है.
आरटीआई कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने उत्तर प्रदेश शासन के बेसिक शिक्षा विभाग से सर्व शिक्षा अभियान वित्त वर्ष 2007-08 से 2011-12 तक की संबंधित सूचना मांगी थी. सूचना नहीं मिलने पर उर्वशी ने उत्तर प्रदेश शासन के बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को अपील भेजी. जिसके बाद सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना कार्यालय की जनसूचना अधिकारी ममता अग्रवाल और सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना कार्यालय की मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी साधना श्रीवास्तव के पत्र से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.
सूचना के अनुसार 5 साल की अवधि में सर्व शिक्षा अभियान के तहत 1,538 शौचालय स्वीकृत कर बनाए गए. भारत सरकार द्वारा इन शौचालयों की प्रति शौचालय अनुमोदित मानक लागत 24 हजार रुपये मात्र थी. जिसके मुताबिक ये शौचालय मानक लागत 24 हजार रुपये प्रति शौचालय की दर से कुल 369 लाख 12 हजार रुपयों में बन जाने चाहिए थे. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने ये 1,538 शौचालय प्रति शौचालय 2 लाख 9 हजार रुपये की दर से कुल 3,225 लाख 81 हजार रुपयों में बनाए.
उर्वशी के मुताबिक इस प्रकार उत्तर प्रदेश के भ्रष्ट और बेशर्म माननीय और अधिकारी 2,856 लाख 69 हजार रुपये पचा गए. इन 2,856 लाख 69 हजार रुपयों से मानक लागत 24 हजार रुपये प्रति शौचालय की दर से कुल 11,902 विद्यालयों में शौचालय बनाकर प्रदेश के करोड़ों बच्चों को मिल सकने बाली यह मूलभूत सुविधा उन्हें नहीं मिल पाई है.
इस प्रकरण में चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि इन रुपयों में से 60 फीसदी से भी ज्यादा यानी 1,944 लाख रुपये केवल आगरा को दिए गए और 40 फीसदी से भी कम में प्रदेश के बाकी जिलों को निपटा दिया गया है.
आरटीआई कार्यकर्ता उर्वशी के अनुसार इस प्रकार का असमान आवंटन प्रकरण में अनियमितताओं की ओर इशारा कर रहा है. उन्होंने बताया कि उनका संगठन येश्वर्याज सेवा संस्थान इस संबंध में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से व्यक्तिगत भेंट कर सर्व शिक्षा अभियान के सभी पहलुओं पर जांच कराने, प्रदेश के बच्चों के 11,902 शौचालय हजम करने वालों को दंडित कराने और बच्चों को शौचालय वापस दिलाने की मांग करेगा.