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ट्रिपल तलाक: 5 जजों की बेंच जिसने सुनाया फैसला, जानिए किसका क्या था मत?

महीनों से जारी बाहस के बाद आखिरकार तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ ही गया. पांच जजों की बेंच ने बहुमत के साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दे दिया है. जानकारी के मुताबिक़ पांच में से दो जज तीन तलाक बनाए रखने के पक्ष में थे.

तीन तलाक पर फैसला तीन तलाक पर फैसला

महीनों से जारी बाहस के बाद आखिरकार तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ ही गया. पांच जजों की बेंच ने बहुमत के साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दे दिया है. जानकारी के मुताबिक़ पांच में से दो जज तीन तलाक के पक्ष में थे. पिछले चुनाव के दौरान बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा बन गया था. माना गया कि मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े समूह ने इस मुद्दे पर बीजेपी सरकार को वोट किया.

आखिर क्या है तीन तलाक़

यह मुसलमानों से जुड़ी एक विवादित प्रथा है. तीन तलाक शरिया का नियम है. जिसमें पुरुष को तीन बार महज तलाक कहने भर से शादी ख़त्म होने का अधिकार मिलता है.

इन पांच जजों की बेंच ने की सुनवाई

विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक बेंच बनाई जो मामले की सुनवाई कर रही है. पांच में से तीन जज इसे ख़त्म करने के पक्ष में बताए जा रहे हैं. बेंच में शामिल सभी जज अलग-अलग धर्मों से हैं. इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी हैं. चीफ जस्टिस खेहर बेंच को लीड कर रहे हैं. वो सिख हैं. जबकि जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई, आरएफ़ नरीमन पारसी, यूयू ललित हिंदू, अब्दुल नज़ीर मुस्लिम हैं.

जस्टिस खेहर: तीन तलाक असंवैधानिक नहीं

28 अगस्त 1952 को चंड़ीगढ़ में जन्मे जस्टिस खेहर ने माना कि यह असंवैधानिक नहीं है. जस्टिस खेहर साइंस ग्रैजुएट हैं और उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई की. 1979 में उन्होंने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में वकालत शुरू की. वो 1999 में पंजाब हाईकोर्ट में जज बनाए गए. 2009 में उत्तराखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जबकि 2011 में सुप्रीम में जज बने. उन्हें इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया. खेहर इसी महीने रिटायर हो जाएंगे.

जस्टिस खेहर ने कहा, तीन तालक हनफी स्कूल के सुन्नियों के लिए महत्वपूर्ण है. उनकी संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. ट्रिपल तालक संविधान के अनुच्छेद 25, 14 और 21 का उल्लंघन नहीं करता. उन्होंने कहा, इसे संवैधानिक नैतिकता के आधार पर अलग रखा जाना चाहिए.

जस्टिस अब्दुल नज़ीर:  तीन तलाक असंवैधानिक नहीं

जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने माना कि तीन तलाक असंवैधानिक नहीं है. 1958 को कर्नाटक में जन्मे जस्टिस नजीर ने 1983 में वक़ालत शुरू की थी. वो कर्नाटक हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते थे. 2003 में उन्हें यहीं अतिरिक्त जज बनाया गया था. फिर यहीं 2004 में स्थायी जज नियुक्त हुए. वो इसी साल सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे.

जस्टिस नजीर ने ट्रिपल तलाक पर फैसले के दौरान सीजेआई खेहर के दृष्टिकोण का समर्थन किया.

जस्टिस कुरियन : तीन तलाक ख़त्म करने के पक्ष में 

30 नवंबर 1953 में केरल में जन्मे जस्टिस कुरियन तीन तलाक ख़त्म करने के पक्ष में हैं. केरल लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से क़ानून की पढ़ाई करने वाले जस्टिस कुरियन ने 1979 के दौरान केरल हाई कोर्ट से वक़ालत शुरू की. वो 1987 में सरकारी वक़ील बने फिर 1994 से 1996 तक एडिशनल जनरल एकवोकेट रहे. 2000 में वो केरल हाई कोर्ट में जज बने. जस्टिस कुरियन दो बार केरल हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायधीश भी रहे.जबकि 2010 से 2013 तक हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश भी रहे. 2013 में ही वो सुप्रीम कोर्ट में जज बने. वो अगले साल रिटायर होंगे.

जस्टिस कुरियन ने कहा, इस्लामी कानून के चार स्रोत हैं. कुरान क़ानून का पहला स्रोत है. तीन तलाक कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ है. यह शरीयत का उल्लंघन करता है.

जस्टिस रोहिंटन : तीन तलाक ख़त्म करने के पक्ष में 

जस्टिस आरएफ नरीमन तीन तलाक जारी रखने के पक्ष में हैं. 1956 को मुंबई में जन्मे जस्टिस नरीमन ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ लॉ में क़ानून की डिग्री ली. उन्होंने हार्वर्ड लॉ ऑफ़ स्कूल से एलएलएम किया. जस्टिस नरीमन 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जज बनें.

जस्टिस रोहिंटन ने कहा, यह तलाक का ऐसा रूप है जिसे कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता. यहां तक कि हनफी कानून में भी तीन तालाक को 'पाप' कहा गया है. 1937 का अधिनियम, अनुच्छेद 13 का उल्लंघन नहीं करता है. उन्होंने कहा, याचिकाकर्ता कोर्ट आए हैं तो अदालत अपने हाथ नहीं खींच सकता. अब अदालत को फैसला करना ही होगा कि यह कानूनी वैध है या नहीं.

यूयू ललित : तीन तलाक ख़त्म करने के पक्ष में

जस्टिस उदय उमेश ललित तीन तलाक को ख़त्म करने के पक्ष में हैं. 1957 में जन्मे जस्टिस ललित ने 1983 से वक़ालत की शुरुआत की. उन्होंने 1985 तक बॉम्बे हाई कोर्ट में वक़ालत की. बाद में प्रैक्टिस के लिए दिल्ली आ गए. 2004 में वो सुप्रीम कोर्ट में सीनियर वक़ील बने. 2014 में जस्टिस ललित सुप्रीम कोर्ट में जज बने.  उन्होंने तीन तलाक को लेकर जोसेफ के  दृष्टिकोण का समर्थन किया.

 

 

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