हिन्दुस्तान के भीतर बीते कई दशकों से तीन तलाक जैसे मुद्दे व्यापक बहस का हिस्सा रहे हैं. एकतरफ जहां अलग-अलग पार्टियां इसके विरोध में रही हैं. तो वहीं मुसलमानों के बीच सक्रिय जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के महिला विंग का मानना है कि तीन तलाक से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के लिए और भी कुछ किए जाने की जरूरत है. इस महिला विंग का मानना है कि महिलाओं को त्वरित न्याय मिलने के लिए उलेमाओं को बीच का रास्ता निकालना चाहिए.
यहां हम आपको बताते चलें कि एक तरफ जहां मुस्लिम संगठन इस बात पर अड़े हैं कि तीन तलाक पर कोई समझौता नहीं हो सकता वहीं उसी संगठन से जुड़ाव रखने वाली महिलाएं कुछ बुनियादी सवाल उठा रही हैं.
जमात-ए-इस्लामी हिन्द की महिला विंग कर रही कोशिश
गौरतलब है कि तीन तलाक, हलाला और बहू विवाह को लेकर मुस्लिम संगठनों की महिलाएं पहले भी सड़क पर उतर चुकी हैं. वो घर-घर जा कर लोगों को इस्लामी कानून के बारे में जागरुक कर रही हैं और तीन तलाक के गलत इस्तेमाल से लोगों को बचने की हिदायतें दे रही हैं. महिला विंग की महिलाएं इस मसले पर मुस्लिम समाज को जगाने के लिए प्रयासरत हैं.
इस विंग से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि 23 अप्रैल से पर्सनल लॉ पर शुरू हुआ जागरुकता अभियान अब तक काफी सफल रहा है. वे आगे कहती हैं कि 23 राज्यों में जागरुकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. उनके अनुसार जमात ने 20 हजार गांव और कुल 100 मिलियन भारतीयों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है. इस पूरे अभियान की विशेष बात महिलाओं का अपने पुरुष प्रधान संगठन से एक अलग सोच रखना भी है. इन महिलाओं का मत इस बात पर बिल्कुल साफ है कि एक बार मे तीन तलाक देना नाजायज है. साथ ही पीड़ित महिलाओं के लिए मुस्लिम समाज और उलेमाओं को कुछ और बेहतर करना होगा.
क्या कहती हैं जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी महिलाएं?
हरियाणा प्रदेश में जमात के महिला विंग की प्रमुख शाइस्ता रफत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उलेमाओं से दरख्वास्त में तीन तलाक को गलत कहती हैं और पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय की मांग करती हैं. हालांकि उनका मानना है कि तीन तलाक मुस्लिम समाज के बजाय मीडिया और सरकार के लिए बड़ा मुद्दा है.
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की रहने वाली और जमात की सचिव अतिया सिद्दीका कहती हैं कि यहां कई ऐसे भी पुरुष हैं जिन्होंने अपनी पत्नियों को तलाक तो नहीं दिया मगर उन्हें यूं ही छोड़ दिया है. ऐसे में वह इन पीड़ित महिलाओं के बारे में भी सोचे जाने की बात कहती हैं.
पर्सनल लॉ मुसलमानों का निजी मामला...
इस संगठन से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि पर्सनल लॉ मुसलमानों का निजी मामला है. इसका अधिकार उन्हें भारत के संविधान से मिला है. कोर्ट या सरकार को इसमें दखल नहीं देना चाहिए. हालांकि वह बदलते वक्त और हालात के साथ उलेमाओं के भी बदलने की बात कहती हैं. इन महिलाओं का मानना है कि मुस्लिम समाज के भीतर तीन तलाक से आगे बढ़ कर भी अशिक्षा और बेरोजगारी जैसे मुद्दे हैं. सरकार को इन पर भी आगे बढ़ने की जरूरत है.