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छात्रों की सबसे प्यारी चीज रह चुकी कलम अब सिर्फ प्लास्टिक कचरा..

एक समय में छात्रों के बीच सुंदर और अच्छी लिखावट वाली कलम रखने की न सिर्फ होड़ लगी रहती थी, बल्कि वे अपनी कलम को लंबे समय तक बहुत सहेज कर भी रखते थे, लेकिन अब यह कलम तेजी से प्लास्टिक के कचरे में तब्दील हो रही है क्योंकि इसमें दोबारा स्याही डालने की मितव्ययी प्रक्रिया खत्म होती जा रही है.

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एक समय में छात्रों के बीच सुंदर और अच्छी लिखावट वाली कलम रखने की न सिर्फ होड़ लगी रहती थी, बल्कि वे अपनी कलम को लंबे समय तक बहुत सहेज कर भी रखते थे, लेकिन अब यह कलम तेजी से प्लास्टिक के कचरे में तब्दील हो रही है क्योंकि इसमें दोबारा स्याही डालने की मितव्ययी प्रक्रिया खत्म होती जा रही है.

दरअसल, 1990 के शुरूआत तक स्याही वाली कलम में बार..बार ‘दवात’ से स्याही भरी जाती थी, लेकिन इसके बाद लोगों का झुकाव अन्य विकल्पों की ओर हो गया. अब, वे तीन रुपये में इसमें स्याही भरने की बजाय पांच रुपये में नयी कलम खरीदने को तवज्जो देने लग गये.

इसके अलावा, ‘इस्तेमाल करो..फेंको कलम’ की भी भारी मांग है क्योंकि यह मात्र दो रुपये में बाजार में उपलब्ध है.

‘लिंक पेन एंड प्लास्टिक्स’ लिमिटेड के प्रबंध निदेशक दीपक जलान ने बताया, ‘‘हमें लगता है कि 80 फीसदी भारतीय उपभोक्ता 10 रुपये से कम कीमत की कलम खरीदते हैं. चूंकि यह कलम सस्ती हंै, इसलिये वह अपने समय से पहले ही जवाब दे देती है.

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देश में लेखन सामग्री के संगठित उद्योग की तीन शीर्ष कंपनियों में शुमार लिंक को प्रत्येक 100 कलम पर 30 ‘रीफील’ बेचने में मशक्कत करनी पड़ रही है. जैन ने बताया कि अनुमान है कि लगभग 70 फीसदी कलम समय से पहले कचरे में तब्दील हो जाते हैं.{mospagebreak}

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कला एवं सौंदर्यशास्त्र विभाग के डीन प्रोफेसर पारूल दवे मुखर्जी ने अफसोस जताया कि पिछले कुछ वषरें में कलम और छात्र के बीच रिश्ता पतन की ओर बढ़ा है.

उन्होंने बताया, ‘‘मुझे कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि यदि आप अपनी कलम के बारे में गंभीर नहीं हैं तो आप अपने लेखन के प्रति भी गंभीर नहीं हैं.

स्कूल शिक्षिका नंदिनी गुहा समान विचार जाहिर करते हुए कहती हैं, ‘‘एप्पल आईपैड, मोबाइल फोन के सबसे नये मॉडल और लैपटॉप जैसे गैजेट का जादू तुरंत ही छात्रों के सर चढ़कर बोलने लगता है. ऐसे में आजकल इन पुरानी कलम के बारे में कौन बात करता है?’

गौरतलब है कि भारत में कलम का कारोबार लगभग 3,000 करोड़ रुपये का है. असंगठित क्षेत्र के कलम उत्पादकों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने की वजह से बड़ी एवं नामी कंपनियों को अपनी कलम की कीमतों में तेजी से कमी लानी पड़ी है.

‘बॉम्बे फाउंटेन पेन मेनुफेक्र्चर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष विपिन सांघवी ने बताया, ‘‘स्याही वाली कलम का बाजार अब बहुत सीमित हो गया है. नयी पीढ़ी आधुनिक, तेज, सस्ती और बिना परेशानी वाली चीजों को खरीदती है.’

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कलम को दोबारा इस्तेमाल नहीं करने की वजह से हर साल भारी मात्रा में इसके कचरे में तब्दील होने पर ‘टॉक्सिक लिंक’ के पर्यावरण कार्यकर्ता रवि अग्रवाल ने बताया, ‘‘यह एक अहम समस्या है क्योंकि दिन ब दिन प्लास्टिक कचरा बढ़ता जा रहा है.’’ उन्होंने बताया, ‘‘उत्पादकों के उपर इस बात को लेकर कोई निगरानी नहीं है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला प्लास्टिक कितना जहरीला है.’

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