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केंद्र सरकार-सुप्रीम कोर्ट के रिश्तों में गर्मी की छुट्टियों के बाद आ सकता है सुधार

दिलचस्प ये देखना होगा कि आखिर जस्टिस गोगोई का रवैया कैसा रहता है, क्योंकि कायदे से उनको 2 अक्तूबर से मुख्य न्यायाधीश बनना है. चीफ जस्टिस अपने रिटायरमेंट से करीब एक महीना पहले अपने उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजते हैं. ऐसे में उनके बागी तेवर और चीफ जस्टिस के साथ उनके रिश्तों का तासीर बरकरार रहती है या फिर छुट्टियों के बाद नई ताजगी आती है. वो देखना शेष है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

गर्मी की छुट्टियों के बाद न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच रिश्ते सामान्य होगे. क्योंकि अब कॉलेजियम बदला हुआ होगा, जस्टिस चेलमेश्वर के रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों के वरिष्ठता क्रम में अब नंबर पांच जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी की कॉलेजियम में एंट्री हो चुकी है.

ऐसे में सरकार के साथ जजों की नियुक्तियों को लेकर चल रही तनातनी वाले रिश्तों में थोड़ी सहजता की उम्मीद की जा सकती है. उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसफ को सुप्रीम कोर्ट लाए जाने के सबसे बड़े पैरोकारों में से एक जस्टिस चेलमेश्वर कॉलेजियम में नहीं होगें.  

हालांकि 43 दिनों की गर्मी छुट्टियों के बाद 2 जुलाई से सुप्रीम कोर्ट खुल रही है, अनुमान है कि अब माहौल बदला-बदला रहेगा. बेंचों में जज बदले होंगे, सरकार के साथ तालमेल के मुद्दे भी शायद बदल जाएं. हालांकि जस्टिस के एम जोसफ को सुप्रीम कोर्ट में लाए जाने का मुद्दा बने रहने के आसार हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए दो वरिष्ठ वकीलों मोहम्मद मंसूर और बशारत अली खान के नाम की कॉलेजियम की सिफारिश लौटाने के सरकार के फैसले पर भी मामला फंस जाए. इन दो सीनियर वकीलों में मोहम्मद मंसूर सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज जस्टिस सगीर अहमद के बेटे भी हैं.

हाईकोर्ट्स में जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों के कॉलेजियम ने 2016 में ही इन दोनों नामों की सिफारिश इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने दो वर्ष तक इन फाइलों को दबाए रखने के बाद मई में इन टिप्पणियों के साथ इन फाइलों को पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम के पास भेज दिया कि इनके खिलाफ कई शिकायतें हैं. लिहाजा इस नजरिये से भी विचार किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट के पुराने अधिकारियों का कहना है कि हो सकता है सरकार को ये नागवार गुजरा हो कि जिन जस्टिस सगीर अहमद ने अपनी रिपोर्ट में कश्मीर की स्वायत्ता की सिफारिश की थी. धारा 370 के भी हिमायती उनके बेटे को इतनी आसानी से इलाहाबाद हाईकोर्ट का जज बनने को हरी झंडी कैसे दी जाए.

बहरहाल, मोहम्मद मंसूर चीफ स्टैंडिंग काउंसिल की हैसियत से हाईकोर्ट में योगी सरकार के फैसलों और नीतियों का बचाव करते रहे हैं. अब कॉलेजियम का मूड इन दोनों गरम रहे मुद्दों पर कैसा रहता है ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि अब हाईकोर्ट्स में जजों की नियुक्ति के लिए तीन वरिष्ठतम जजो के कॉलेजियम में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन बी लोकुर इन मुद्दों पर कैसी राय रखते हैं. गौर करने वाली बात ये भी है कि इनमें से दो तो प्रेस कांफ्रेंस करने वाले बागी दल में भी रहे हैं.

ये तीन जज सुप्रीम कोर्ट में जजों के एलिवेशन के लिए बने कॉलेजियम का भी हिस्सा हैं. बस इन तीनों के बाद उसमें जस्टिस कुरियन जोसफ और जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी भी शामिल हो जाऐंगे. जस्टिस जोसफ भी भी प्रेस कांफ्रेंस वाले गुट में रहे हैं. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के लिए पांच जजों के कॉलेजियम में तीन तो तेवर वाले जज रहेंगे ही.

ऐसे में दिलचस्प ये देखना होगा कि आखिर जस्टिस गोगोई का रवैया कैसा रहता है, क्योंकि कायदे से उनको 2 अक्तूबर से मुख्य न्यायाधीश बनना है. चीफ जस्टिस अपने रिटायरमेंट से करीब एक महीना पहले अपने उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजते हैं. ऐसे में उनके बागी तेवर और चीफ जस्टिस के साथ उनके रिश्तों का तासीर बरकरार रहती है या फिर छुट्टियों के बाद नई ताजगी आती है. वो देखना शेष है.

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