न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव को लेकर भारत के 4 पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने चिंता व्यक्त की है. उन्होंने प्रश्न उठाया है कि कैसे केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की ओर से भेजी गई लिस्ट पर फैसला लेने से पहले सीजेआई दीपक मिश्रा से चर्चा तक नहीं की.
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने कहा, 'ये न्यायपालिका की आजादी के दिल पर हमला है.'
कॉलेजियम की सिफारिशों को पहले कई हफ्तों तक अटकाए रखना और फिर उसमें से सिर्फ एक नाम को चुनना, एक नए प्रचलन को दिखाता है. ये ऐसा है जैसे सरकार अपने अनुकूल नाम का चुनाव कर रही है और जो अनुकूल नहीं है उनके नाम पर रोक लगा रही है. ये न्यायपालिका में हस्तक्षेप है.
पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने कहा, ऐसी स्थिति में सीजेआई दीपक मिश्रा को तत्काल प्रभाव से कॉलेजियम की मीटिंग बुलानी चाहिए और सरकार से इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए.'
जस्टिस लोढ़ा ने कहा, मेरे कार्यकाल के दौरान 2014 में भी ऐसा ही हुआ था. तब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए भेजे गए पैनल के 4 नामों को दरकिनार करते हुए पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के नाम पर मुहर लगाई थी. तब मैं देश से बाहर था.
इसके बाद मैंने तत्कालीन कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद को लेटर लिख कर नाराजगी जाहिर की थी. साथ ही सरकार से कहा था कि वह भविष्य में ऐसे एकतरफा फैसले न ले. मेरी जानकारी और सहमति के बिना मैं नामों को अलग करने की मंजूरी नहीं दे सकता. कार्यपालिका को इस तरह के फैसले नहीं लेने चाहिए.
जस्टिस लोढ़ा ने कहा, हालिया घटनाक्रम से गलत संदेश गया है. जस्टिस केएम जोसेफ की नियुक्ति क्यों रोकी गई ये साफ तौर से पता चल रहा है.
वहीं, पूर्व सीजेआई टीएस ठाकुर ने इस पूरी घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस ने 2 पूर्व सीजेआई और 4 अन्य पूर्व जज से बात की. उन लोगों ने भी इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की. उनका कहना था कि कॉलेजियम की सिफारिशों को केंद्र सरकार की ओर से रोके जाने पर सीजेआई को बात करनी चाहिए.
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने कहा, मुझे हैरान हूं कि सीजेआई ने कोर्ट में कहा कि सिफारिश किए गए नाम की फाइल को वापस लौटाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में है. मुझे संदेह है कि क्या उन्होंने इस बयान से पहले कॉलेजियम में अपने सहयोगियों से परामर्श लिया है.
जस्टिस शाह ने कहा, ये साफ है कि जस्टिस जोसेफ का नाम इस लिए रोका गया क्योंकि उन्होंने 2016 में केंद्र के खिलाफ फैसला दिया था. वह इस पद के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति है. केंद्र सरकार से इस संबंधित बात न करने पर जस्टिस शाह ने सीजेआई की आलोचना भी की.
बता दें, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जजों के नामों की सिफारिश की थी. इसमें जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ का नाम शामिल था. केंद्र सरकार ने इसमें से सिर्फ इंदु मल्होत्रा के नाम पर मुहर लगाई. वहीं, जस्टिस केएम जोसेफ के नाम को पेंडिग लिस्ट में डाल दिया. जस्टिस जोसेफ अभी उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं.