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क्या करती है सेलेक्ट कमिटी, सरकार इससे क्यों बच रही?

तीन तलाक को लेकर पेश किए गए बिल को कांग्रेस की अगुवाई में 17 दल सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग कर रहे हैं, आखिर ये सेलेक्ट कमिटी है क्या और क्या करती है जिससे सरकार डर रही है.

तीन तलाक पर केस राज्यसभा में फंसा तीन तलाक पर केस राज्यसभा में फंसा

तीन तलाक यानी इंस्टेंट तलाक को अपराध बनाने के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017 बुधवार को राज्यसभा में पेश किया गया. लेकिन कांग्रेस समेत 17 दल वर्तमान बिल को सेलेक्ट कमिटी को भेजने की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार इसके बिल्कुल खिलाफ है और ऐसा करने से मना कर दिया.

सरकार की ओर से वित्‍त मंत्री अरुण जेटली और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बिल पर मोर्चा संभाला जबकि कांग्रेस की तरफ से आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद ने इस बिल पर सवाल खड़े किए, साथ ही इसे सेलेक्ट कमिटी यानी स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की.

सरकार की ओर से अरुण जेटली ने कहा कि बिल को सेलेक्‍ट कमेटी के पास नहीं भेजा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर रखा है और कोर्ट के 2 जजों ने छह महीने के लिए तीन तलाक पर रोक लगाई थी और वो अवधि 22 फरवरी को पूरी हो रही है.

जबकि लोकसभा में बिल का समर्थन करने वाली कांग्रेस का तेवर राज्यसभा में बदला हुआ दिखा और उसकी ओर से पूरा जोर बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने पर था. आनंद शर्मा ने कहा कि अगर डेडलाइन 22 फरवरी है, तो इसे बजट सत्र के पहले सप्ताह में लाइए. बजट सत्र भी इसी महीने के अंतिम हफ्ते में शुरू हो रहा है. राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग विधेयक 2017 (मेडिकल बिल) पर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने बताता था कि संसदीय समिति को एक विधेयक को देखने में कम से कम तीन महीने का समय लगता है, ऐसे में इस बिल के लटकने की संभावना ज्यादा ही है.

सेलेक्ट कमिटी का क्या काम

संसद अपने कामकाज निपटाने के लिए कई तरह की कमिटियों यानी संसदीय समितियों का गठन करती है. इन समितियों का गठन सरकारी कामकाज पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने के लिए भी किया जाता है.

संसदीय समितियां दो तरह की होती हैं, तदर्थ और स्थायी. तदर्थ समिति का गठन किसी खास मामले या उद्देश्य के लिए किया जाता है, उसका अस्तित्व तभी तक कायम रहता है, जब तक वह इस मामले में अपना काम पूरा कर रिपोर्ट सदन को सौंप नहीं दे. जबकि स्थायी समिति का काम फिक्स होता है. लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति, विशेषाधिकार समिति और सरकारी आश्वासन समिति जैसी कई तरह की स्थायी समितियां होती हैं. विभागीय आधारित 24 तरह की स्थायी समितियां होती हैं जिसमें 21 लोकसभा और 10 राज्यसभा के सदस्य होते हैं. हर समिति में सदस्यों की संख्या अलग-अलग होती है. इसके अलावा अन्य तरह की स्थायी समिति भी होती हैं.

प्रवर समिति और संयुक्त समिति के रूप में तदर्थ समिति दो प्रकार की होती हैं, इन दोनों ही समितियों का कार्य सदन में पेश बिल (विधेयकों) पर विचार करना होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि सदन की ओर से इन दोनों समितियों के पास सभी विधेयकों पर विचार के लिए भेजा ही जाए.

प्रवर समिति भेजे गए बिल के सभी मामलों पर गंभीरता से विचार करती है. विचार के बाद समिति किसी भी मामले पर अपने सुझाव दे सकती है. यह समिति बिल से संबंधित संगठनों, विशेषज्ञों और अन्य लोगों से उनकी राय ले सकती है. बिल पर गहन विचार-विमर्श के बाद प्रवर समिति अपने संशोधनों और सुझावों के साथ सदन को रिपोर्ट सौंपती है. अगर समिति का कोई सदस्य संबंधित बिल पर असहमत होता है तो उसकी असहमति भी रिपोर्ट के साथ भेजी जा सकती है.

दोनों सदनों में बिल का पास होना जरूरी

अगर तीन तलाक से जुड़ा यह बिल विपक्ष प्रवर समिति के पास भिजवाने में कामयाब रही तो सरकार इसे संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में पारित नहीं करवा सकेगी. वैसे भी शीत सत्र में महज 2 दिन ही शेष हैं. किसी भी बिल को कानून का रूप लेने के लिए इसे दोनों सदनों से पास करवाना जरूरी होता है.

लोकसभा में यह बिल 28 दिसंबर को पेश किया गया था जो 7 घंटे तक चली बहस के बाद पास हो गया था. बहस के बाद कई संशोधन भी पेश किए गए, लेकिन सदन में सब निरस्त कर दिए गए. इनमें AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भी 3 संधोधन थे.

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