प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने योजना आयोग से नक्सलवाद प्रभावित जिलों के लिए विशेष पैकेज तैयार करने को कहा है और आयोग का मानना है कि इस तरह के क्षेत्रों को राज्य स्तरीय नियमों के जंजाल से छूट दी जाए.
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने यह जानकारी दी. अहलुवालिया ने कहा, ‘प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना है कि नक्सल प्रभावित जिलों पर काम किए जाने की जरूरत है. ऐसा पहली बार हुआ है. हम पूरी विकास रणनीति पर विचार कर रहे हैं.’
गृह मंत्रालय ने 2008 में नक्सलप्रभावित 33 जिलों को चिन्हित किया जो आठ राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा तथा उत्तरप्रदेश में फैले हैं. विशेषकर बांस तथा तेंदु पत्ता आदि जैसे छोटे वन उत्पादों के दोहन में आदिवासियों को आ रही दिक्कत का जिक्र करते हुए आहलूवालिया ने कहा (इस पर राज्यों के वन विभागों का नियंत्रण नहीं होना चाहिए) इससे तो उन्हें लगता है कि उन्होंने आजीविका का अधिकार ही खो दिया.
उन्होंने कहा कि आयोग पेसा (पंचायतस एक्सटेंशन टु शेडूयल एरिया) कानून 1996 के कार्यान्वयन की संभावना टटोल रहा है ताकि आदिवासियों को छोटे मोटे वन उत्पादों के इस्तेमाल का अधिकार मिल सके. आहलूवालिया ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों के विकास में धन कोई मुद्दा नहीं है. उन्होंने कहा, 'कुछ समस्याओं के निराकरण के लिए धन चाहिए होता जबकि कुछ समस्याओं के लिए गवर्नेंस बदलाव की जरूरत रहती है.'
आहलूवालिया ने कहा कि योजना आयोग ने पहले भी इसके लिए एक समिति गठित की थी लेकिन मामले को 'संपूर्णता' से नहीं लिया गया. प्रधानमंत्री ने कहा है कि नक्सलवाद सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती के रूप में सामने आया है और वे तीन साल से ऐसा कह रहे हैं. उनका कहना है कि इस मामले में केंद्र व राज्यों में सहयोग बहुत जरूरी है और केंद्र को राज्यों की हर तरह से हरसंभव मदद करनी होगी.