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बेटियों में देवी की तलाश और बलात्कार

नवरात्र का त्योहार था. कन्या-पूजन का दिन. नन्ही-नन्ही बच्चियों को दुर्गा का रूप मानकर पूजा जा रहा था. खाने को हलवा-पूरी और चंद रुपयों का शगुन दिया जा रहा था. 'गुड़िया' को भी बुलावा था. वह भी सज-धजकर जाती. पकवान खाती. दोस्तों के साथ खेलती. पर वो तो किसी कोठरी में पड़ी थी. बेहोश. छलनी. लथपथ.

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नवरात्र का त्योहार था. कन्या-पूजन का दिन. नन्ही-नन्ही बच्चियों को दुर्गा का रूप मानकर पूजा जा रहा था. खाने को हलवा-पूरी और चंद रुपयों का शगुन दिया जा रहा था. 'गुड़िया' को भी बुलावा था. वह भी सज-धजकर जाती. पकवान खाती. दोस्तों के साथ खेलती. पर वो तो किसी कोठरी में पड़ी थी. बेहोश. छलनी. लथपथ.

जब हम आप त्योहार मना रहे थे, बेटियों में देवी तलाश रहे थे, 'गुड़िया' के मां-बाप उस बेटी को खोज रहे थे, जो 3 दिन से लापता थी.

एक तालाबंद कमरे से कमज़ोर सिसकियों का सिलसिला रह-रहकर उठ रहा था. पड़ोसियों को शक हुआ. ताला तोड़ा गया. दरवाज़ा खुला, तो बस खून दिखा. और खून में सनी नन्ही-सी परी. दर्द के जाने किस दरिया में समाई. दरिंदगी की कैसी हदों को सहती हुई. 40 घंटों से गुड़िया कैद थी- बेसुध.

15 अप्रैल की शाम अपने बाकी दोस्तों के साथ खेल रही थी. खिलखिलाती हुई, इठलाती हुई. खेल ही तो लगा होगा उसे, जब फुसलाकर वो उसे घर ले गया. वो भेड़िया, दरिंदा. क्या पलभर को भी वह मासूम मुस्कुराहट उसे पिघला नहीं पाई होगी. उसके उन प्यार भरे होठों को, प्यारे से गाल को नोचते हुए काटते हुए उसके हाथ नहीं कांपे होंगे.

कितना चाहा होगा उसने मां को पुकारे. कितनी कोशिश की होगी उठ खड़े होने की. कितनी बेबस रही होगी उसकी मासूमियत. वो तो अभी जिंदगी और मौत का फर्क भी नहीं जानती थी. और आज वो ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही है. आप ये मत समझिएगा कि दरिंदे ने उसे दया कर ज़िंदा छोड़ दिया. उसने तो वहशीपन ही हदें पार करने के बाद उसका गला घोंटा. मुर्दा समझ के छोड़ा था उस नन्ही सी जान को.

उसके फूल से भी कोमल शरीर में मोमबत्तियां और साबुत बोतल समा दिया. दर्द से कितना कराही होगी गुड़िया. उसकी चीखों को कैसे दबाया होगा दरिंदे ने.

सम्मान, स्वाभिमान, इज्जत, आबरू, बलात्कार- इन चीज़ों की बातें हम कर रहे हैं. 'गुड़िया' इन शब्दों को समझना तो दूर, ठीक से बोल भी नहीं सकती. ये कैसा समाज दिया है हमने उसे. ये कैसी व्यवस्था.

नाराज़ भी हों, तो किससे? गुस्सा करें तो किसपर? उस पुलिस पर जो संवेदना समझती ही नहीं. उन सियासतदान पर जो कानून बनाते हुए भी राजनीति करते हैं. उस न्याय व्यवस्था पर जो महीनों बीत जाने पर भी लाचार है. या फिर समाज पर, खुद पर.

'गुड़िया' की चिंता मत करिए. मुश्किल है, पर 'गुड़िया' जिंदगी की जंग जरूर जीतेगी. चिंता करिए उस वीभत्स होते समाज की, जो ये जंग हारता जा रहा है.

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