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व्यंग्य: चिट्ठी आई है, मुंगेर में हैं राहुल

ये तो ब्रेकिंग न्यूज है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बिहार में हैं. यह जानकारी राहुल की ही एक चिट्ठी से मिली है. हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लंबे समय से छुट्टी पर चल रहे राहुल गांधी को एक पत्र भेजा था .

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राहुल गांधी, मनमोहन सिंह राहुल गांधी, मनमोहन सिंह

ये तो ब्रेकिंग न्यूज है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बिहार में हैं. यह जानकारी राहुल की ही एक चिट्ठी से मिली है. हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लंबे समय से छुट्टी पर चल रहे राहुल गांधी को एक पत्र भेजा था . राहुल ने उसी पत्र का जवाब भेजा है. लिफाफे पर मुंगेर पोस्ट ऑफिस की सील है, यानी वहीं से इसे पोस्ट किया गया है. पूरी डिटेल के लिए वो चिट्ठी हम आपसे जस की तस शेयर कर रहे हैं -

रेस्पेक्टेड सर जी,
आपका पत्र मिला. पूरा हाल-सामाचार मिला. पढ़ कर बहुते खुशी हुई. ऐसा लगा जैसे आपका भाषण सुन रहा हूं. बिलकुल, धीरे धीरे. एक बार पढ़ा तो लगा कुछ छूट गया. सो, फिर दो-तीन बार और पढ़ लिया.

आगे आपको बता दें कि हम जल्दिए आ रहे हैं. यहां बड़ी बादरेशन है. न बिजली रहती है, न नेट चलता है. मच्छर तो इतने हैं कि पूछो मत.

किसी को बताइएगा मत. हम कहीं बिदेस नहीं गए थे. चिट्ठी पढ़के तो समझिए रहे होंगे. मीडियावालों को भरमाने के लिए कुछ दिन पहाड़ों में जरूर रहे. उसके बाद सीधे समस्तीपुर चले आए. फिर जहां-जहां लालू अंकल बोले हम घूमते रहे. कभी मधुबनी, तो कभी गया, तो कभी मुजफ्फरपुर. लेकिन हर जगह से घूमफिर के पटने आ जाते रहे.

हम मांझी अंकल के घर भी गए थे. बहुत चूहा पाल के रखे हैं. हर तरफ चूहे-चूहा. वहां खूब चूहा दौड़ भी होती है.

मुजफ्फरपुर भी गए थे. वहां गजब की जलेबी और दाल मिलती है. मस्त. लिट्टी-चोखा भी उसके आगे फेल है. मैं तो कहूंगा जब कभी मौका मिले वहां जाकर एक बार जलेबी और दाल जरूर खाइए.

वैसे एक बात है. हम एतना ना घूम दिए हैं कि भोट पड़ेगा तो देखिएगा. झोर के लोग कांग्रेसे का बटन दबाएंगे. लालू अंकल लालटेन दिए थे. लेकिन हम कहीं जलाए ही नहीं. ऊ हमको बुड़बक समझते हैं ना. बताएंगे उन्हें कि हम क्या हैं. हमको दिल्ली आने तो दीजिए. ई लोग का सब हमने अंदर तक देख लिया है.

फील्ड में निकलना बहुते जरूरी था. आप तो जानते ही हैं आगे न तो राज्य सभा से काम चलता और न अमेठी से राजनीति. छह महीने बाद यहां भोट पड़ेगा, इसीलिए हम मम्मी से पूछकर यहां चले आए. हम आपको गुरु जरूर मानते थे, लेकिन असली पोलिटिक्स तो हमने बिहार में आकर ही सीखी. यहां तो गजबे पोलिटिक्स है.

आपकी चिट्ठी से मालूम हुआ कि आपको भी एक कागज मिला है. कागज से परेशान तो बिलकुले मत होइएगा. जब जी में आए फाड़ के फेंक दीजिएगा. मन हल्का हो जाएगा. वइसे आपको तो रोज दो तीन बार ऐसा करना चाहिए. आप पगड़ी ही नीले रंग की नहीं पहनते, आप नीलकंठ भी हैं. जहर का घूंट कैसे पीया जाता है, ये तो मैंने आपही से सीखा. इसीलिए तो आपको अपना गुरु मानता रहा, ये बात अलग है कि आपकी तरह मैं भी मम्मी की बात नहीं मान पाता. अगर आप कागज नहीं फाड़ पाए तो भी कोई बात नहीं. मैं आते ही फाड़ के फेंक दूंगा.

एक बात बताइए, वो कागज कोर्ट का तो नहीं है ना. आपने कुछ तारीख की बात की है. एक मेरा भी कागज आया होगा. वैसा वाला कागज हम कभी नहीं फाड़ते. लेकिन चिंता की कोई बात नहीं मम्मी ने इतने अंकल पाल रखे हैं. आखिर कब काम आएंगे? कपि अंकल, चिद्दू अंकल, मनी अंकल, अभि अंकल - इतने सारे तो हैं. कागज लेके चले जाएंगे.

आपसे पता चला मम्मी खूब मार्च कर रही है. अच्छा किया आपने बता दिया. अब तो अप्रैल आने वाला है और अब मार्च के लिए साल भर इंतजार करना पड़ेगा.

थोड़ा लिखूं, ज्यादा समझना. चिट्ठी को तार समझना. पत्र का जवाब जल्द से जल्द देना.

आपका,
भूतपूर्व राजनीतिक शिष्य
मुंगेर, बिहार से.

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