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RTI फाइल करके सुप्रीम कोर्ट से ली जा सकती हैं ये जानकारियां

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी सूचना का अधिकार के तहत लाए जाने का आदेश दिया गया था.फैसले के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर यानी सचिवालय भी आरटीआई के दायरे में होगा.

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

  • आरटीआई के तहत आएगा CJI का कार्यालय
  • SC के पांच जजों की बेंच ने सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दिया है कि वो खुद भी सूचना के अधिकार की जद में है. सूचना का अधिकार के तहत आम जनता कोर्ट से भी जानकारी मांग सकती है, लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार पर असर डालने वाली जानकारी नहीं दी जाएगी. हालांकि देश की सबसे बड़ी अदालत के इस फैसले को क्रांतिकारी और अभूतपूर्व कहा जा रहा है.

SC ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने कहा कि कुछ मुद्दों पर अस्पष्टता और ग्रे एरिया है जिसका फायदा उठाकर अधिकारी जानकारी देने से मना कर सकते हैं. हालांकि इसका खुलासा तो आरटीआई के तहत आवेदन के बाद ही हो सकेगा. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी सूचना का अधिकार के तहत लाए जाने का आदेश दिया गया था.

फैसले के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर यानी सचिवालय भी आरटीआई के दायरे में होगा. जानिए आरटीआई के तहत जनता सुप्रीम कोर्ट से कौन सी जानकारी हासिल कर सकती है और कौन सी नहीं.

-आम नागरिक सुप्रीम कोर्ट के जजों की चल अचल संपत्ति से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकते हैं.

- हाईकोर्ट के जजों की चयन, नियुक्ति की प्रक्रिया के तहत कोलेजियम के फैसलों की जानकारी हासिल की जा सकती है.

-जजों के वरिष्ठता क्रम की जानकारी प्राप्त की जा सकती है.

-चीफ जस्टिस बनने और कार्यकाल की जानकारी मिल सकती है.

RTI के तहत नहीं मुहैया कराई जाएंगी ये जानकारियां

- निजी और वरिष्ठता क्रम में किसी किस्म के बदलाव को लेकर मांगी गई जानकारी नहीं दी जाएगी.

- चीफ जस्टिस के साथ सरकार यानी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या विधि और न्याय मंत्री के साथ पत्राचार की जानकारी नहीं मिलेगी.

- आरटीआई एक्ट के नियम 8 (1) (J) के तहत ऐसी सूचना नहीं मिल सकती, जिससे जजों या कोर्ट के किसी भी अधिकारी का किसी आम नागरिक की तरह ही निजता के अधिकार का उल्लंघन होता हो.

- न्यायपालिका की स्वायत्तता और गरिमा के साथ ही निजता के अधिकार को भी ध्यान में रखते हुए ये मुख्य सूचना अधिकारी तय करेगा कि क्या सूचना दी जा सकती है क्या नहीं. यानी इन मामलों में आरटीआई का कोई प्रावधान भी काम नहीं आएगा.

इन प्रावधानों के साथ सूचना हासिल करने वाले नागरिक को कोई अन्य संवेदनशील सूचना हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य सूचना अधिकारी को ये भी बताना होगा कि आखिर इससे जनता का क्या और कैसा हित जुड़ा है. यानी जानकारी हासिल करने के लिए पब्लिक इंटरेस्ट भी साबित करना जरूरी होगा.

कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य सूचना अधिकारी यानी पीआईओ को ये विवेकाधिकार दिया है कि वो तय करे कि निजता और सूचना का अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए क्या सूचना साझा की जा सकती है और क्या नहीं.

फैसला क्रांतिकारी तो है लेकिन निजता का अधिकार और सूचना का अधिकार के बीच तालमेल ही वो धुरी है जहां इस पूरे फैसले की संवेदनशीलता की सूई टिकी है.

RTI मामले में क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में आता है. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपक गुप्ता ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है. इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के इस संबंध में 2010 के फैसले को बरकरार रखा.

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