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....इन कारणों से BJP ने छोड़ा आडवाणी का साथ और थामा मोदी का हाथ!

अपनी पार्टी से नाराज भारतीय जनता पार्टी के 'भीष्म पितामह' लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है. पार्टी से सभी बड़े नेता उनके मान-मनौव्वल में लगे हैं, लेकिन तमाम कोशिशें की बावजूद आडवाणी की नाराजगी खत्म नहीं हुई है.

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लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी
लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी

अपनी पार्टी से नाराज भारतीय जनता पार्टी के 'भीष्म पितामह' लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है. पार्टी से सभी बड़े नेता उनके मान-मनौव्वल में लगे हैं, लेकिन तमाम कोशिशों की बावजूद आडवाणी की नाराजगी खत्म नहीं हुई है.

सूत्रों के हवाले से खबर यह भी कि बीजेपी आडवाणी को मनाने की कोशिश तो कर रही है, पर इसके लिए नरेंद्र मोदी पर लिए गए फैसले से वो पीछे हटने को तैयार नहीं है.

अब हर किसी के मन में एक ही सवाल है, आखिर ऐसी क्या वजह है कि नरेंद्र मोदी की खातिर बीजेपी दिग्गज आडवाणी को नजरअंदाज करने को भी तैयार है. संभव है कि इसके कई कारण हों. आइए इन्हीं कारणों की करते हैं पड़तालः

जो लोकप्रिय होता है वही नेता होता है
गोवा बीजेपी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते वक्त जब पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह कहा कि जो लोकप्रिय होता है, वही नेता होता है. तो उनका इशारा साफ था कि अब बीजेपी की नैय्या के खेवैया मोदी होंगे. इसकी वजह है मोदी की लोकप्रियता. गुजरात की जनता के साथ देश के युवाओं के बीच भी मोदी की अच्छी पकड़ है. असाधारण वाकपाटुता की वजह से मोदी मिडिल क्लास के भी हीरो हैं. पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच मोदी को लेकर जबरदस्त उत्साह है. ऐसे में पार्टी के लिए उनकी लोकप्रियता को नजरअंदाज करना बेहद मुश्किल है.

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आरएसएस की चाह के खिलाफ कैसे जाए बीजेपी?
मोदी की ताजपोशी के पीछे आरएसएस की अहम भूमिका रही. संघ के दबाव के बाद ही पार्टी ने गोवा कार्यकारिणी में आनन-फानन में मोदी को चुनावी कमांडर बना दिया. ऐसा विरले ही हुआ है जब बीजेपी संघ के किसी निर्देश के खिलाफ गई हो, ऐसे में इस निर्णय को बदल पाना आसान भी नहीं था. दरअसल, बीजेपी को आगामी लोकसभा चुनाव में संघ के कार्यकर्ताओं की जरूरत पड़ेगी. क्योंकि संघ का संगठन देश में मोदी के लिए लहर बनाने का काम करेगा, जिसे पार्टी चुनावी फायदे और नुकसान से जोड़ कर देख रही है.

बात वर्तमान की नहीं, भविष्य की है
आडवाणी के पार्टी में इस तरह अलग-थलग पड़ने की वजह उनकी उम्र भी है. आडवाणी 84 साल के हैं. आने वाले समय में राजनीति में उनकी सक्रियता को लेकर संशय बरकरार है. वहीं, पार्टी अपने भविष्य की सोच रही है. अगर मोदी पार्टी का नेतृत्व संभालते हैं तो अगले 10-15 साल तक के लिए बीजेपी नेतृत्व की चिंता से निजात पा लेगी.

लंगड़े घोड़े पर कौन लगाए सट्टा?
2009 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी को करारी हार सामना करना पड़ा था. इसके बाद आडवाणी की लोकप्रियता धीरे-धीरे घटने लगी. मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में आडवाणी को कमान सौंपने से पार्टी को चुनावी फायदा होगा, इसे लेकर गंभीर सवाल है.

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...ताकि नेता को लेकर वोटर भ्रम में न रहें
एनडीए में पीएम उम्मीदवारी को लेकर मची खींचतान पर मीडिया में आ रही खबरों पर पार्टी विराम लगाना चाहती है. इस मुद्दे पर बीजेपी अपना रुख साफ कर देना चाहती है. ताकि मतदाताओं के बीच अगले चुनाव में पार्टी के चेहरे के लेकर स्थिति स्पष्ट हो. वहीं, गठबंधन के साथियों को इशारों ही इशारों में पार्टी के रुख का खबर हो जाए. पार्टी ने भले ही मोदी को चुनावी कमांडर बनाया है, यह उनकी पीएम उम्मीदवारी की ओर एक और मजबूत कदम है.

चुनावी सर्वे में भी मोदी आगे
पार्टी के फैसले के पीछे कुछ हद तक चुनावी सर्वे की भूमिका भी रही होगी. लगभग सारे चुनावी सर्वेक्षणों में मोदी बीजेपी के सबसे पसंदीदा चेहरे बनकर उभर रहे हैं. चाहे वह पीएम पद को लेकर उनकी दावेदारी हो या फिर उन्हें नेता घोषित करने के बाद बीजेपी की मिलने वाली सीटों की स्थिति. हर मोर्चे पर मोदी के साथ ही पार्टी को फायदा मिलता दिख रहा है. ऐसे में पार्टी जनता के मूड के साथ जाना चाहेगी.

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