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4 महीने बाद भी राहुल गांधी क्यों नहीं कर पाए कार्यसमिति का गठन? INSIDE STORY

राहुल गांधी खुद कार्यसमिति के सदस्यों के चुनाव के पक्ष में माने जाते रहे हैं. लेकिन चुनाव कराकर पार्टी के नेताओं में विभाजन और फूट की आशंका के चलते चुनाव की बजाय मनोनयन को तरजीह दी गई.

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राहुल गांधी (फाइल फोटो)
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल के कमान संभालने के बाद कांग्रेस पार्टी में फैसले लेने की सबसे बड़ी बॉडी कार्यसमिति का गठन अब तक नहीं हो सका है. तालकटोरा स्टेडियम में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में राहुल गांधी को कार्यसमिति चुनने का अधिकार दे दिया गया था. इससे पहले सीताराम केसरी के कार्यकाल में आखिरी बार कार्यसमिति का चुनाव हुआ था. इसके बाद सोनिया के वक़्त कभी कार्यसमिति का चुनाव नहीं हुआ.

राहुल गांधी खुद कार्यसमिति के सदस्यों के चुनाव के पक्ष में माने जाते रहे हैं. लेकिन चुनाव कराकर पार्टी के नेताओं में विभाजन और फूट की आशंका के चलते चुनाव की बजाय मनोनयन को तरजीह दे दी गई. बीते 18 दिसम्बर को पार्टी ने एक सुर से कांग्रेस अध्यक्ष को कार्यसमिति चुनने का प्रस्ताव पास किया था. लेकिन 4 महीने होने को आये लेकिन राहुल गांधी अब तक अपनी कार्यसमिति का ऐलान नहीं कर सके हैं.

नेताओं के चुनाव में मुश्किल

सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी पार्टी की सबसे बड़ी बॉडी में काफी बदलाव करना चाहते हैं. हालांकि, वो युवा और वरिष्ठ नेताओं का सामंजस्य रखना चाहते हैं, लेकिन पसंद राहुल की होगी. ऐसे में कई वो पुराने चेहरे जो सोनिया की चुनी कार्यसमिति में थे और राहुल की भी गुडबुक में हैं, उनको लेकर तो कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन ऐसे पुराने चेहरे जो सोनिया की गुडबुक में रहे, लेकिन राहुल को पसंद नहीं, परेशानी उनको लेकर है.

कांग्रेस अध्यक्ष एक झटके में कार्यसमिति का गठन करेंगे, इसीलिये उनके सलाहकारों की नजर कर्नाटक चुनावों पर है. राहुल के करीबियों को लगता है कि, वैसे तो पार्टी में राहुल के इक़बाल पर कोई दोमत नहीं है. फिर सोनिया गांधी खुद भी बड़े नेताओं के सामने राहुल से बदलाव करने को कह चुकी हैं. लेकिन टीम राहुल चाहती है कि, जैसे गुजरात चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद उनका कद पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ा और उन्होंने पार्टी संगठन में बदलाव किये वैसे ही कर्नाटक में बेहतर प्रदर्शन के बाद वो कार्यसमिति का गठन करेंगे तो ज्यादा कारगार साबित होगा. साथ ही टीम से आउट नेताओं को कार्यकर्ताओं का समर्थन भी नहीं मिलेगा.

थोपना नहीं चाहते फैसला

कुल मिलाकर राहुल चाहते हैं कि, वो जो भी फैसले करें उनको दिल से कार्यकर्ताओं का समर्थन मिले. वरना सोनिया गांधी की कांग्रेस अब राहुल की कांग्रेस हो चुकी है. ऐसे में उनको फैसले लेने से भला कौन रोक सकता है. फिर भी टीम राहुल चाहती है कि, जो भी बड़ा फैसला हो वो थोपा हुआ ना लगे, जबकि पार्टी के भीतर इस देरी को लेकर सवाल उठने लगे हैं. सबसे ज़्यादा सवाल महाभियोग लाने को लेकर उठे, जब पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद रहे और बिना कार्यसमिति के फैसला ले लिया गया.

इस मुद्दे पर 'आजतक' से बातचीत करते हुए कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह ने कहा कि, राहुल जी के फैसलों पर पूरी पार्टी को यकीन है, वो सोच समझकर सही वक़्त पर सही फैसला लेंगे. पार्टी में सबकी सलाह लेकर और सबको साथ लेकर ही वो चलते आये हैं.

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