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कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर फैसलों में सोनिया से अलग दिखा अंदाज–ए-राहुल

आखिर क्या है फर्क? पार्टी अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी और राहुल गांधी के कामकाज में? सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ये पार्टी 10 साल तक केंद्र की सत्ता में रही, लेकिन ये भी सच है कि उनकी अध्यक्षता में ही कांग्रेस ने 2014 में अपने लोकसभा चुनावी इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी सोनिया गांधी और राहुल गांधी

राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बने करीब चार महीने होने वाले हैं. पार्टी अध्यक्ष के नाते उनकी पहली बड़ी परीक्षा कर्नाटक विधानसभा चुनाव हैं जहां 12 मई को वोटिंग होनी है. एक तरफ राहुल का ध्यान कर्नाटक में कांग्रेस के किले को बचाने पर है तो दूसरी ओर वो चाहते हैं कि उनकी अध्यक्षता में कांग्रेस का नया अवतार लोगों को देखने को मिले. राहुल 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' में एक झटके की बजाए किश्तों में बदलाव कर रहे हैं. वो तेजी से लेकिन सोच समझ कर फैसले ले रहे हैं. उनकी यही कोशिश है कि कहीं भी कोई बगावत की गुंजाइश ना रहे. सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे अहमद पटेल से कई मौकों पर सलाह मशविरा करके राहुल उनको भी साधे रखना चाहते हैं.

आखिर क्या है फर्क? पार्टी अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी और राहुल गांधी के कामकाज में? सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ये पार्टी 10 साल तक केंद्र की सत्ता में रही, लेकिन ये भी सच है कि उनकी अध्यक्षता में ही कांग्रेस ने 2014 में अपने लोकसभा चुनावी इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया. पार्टी लोकसभा में 44 सीटों पर ही सिमट गई. कांग्रेस वो चुनाव सोनिया के नेतृत्व में बेशक हारी, लेकिन इसके लिए सबके निशाने पर राहुल गांधी ही रहे.   

सूत्रों के मुताबिक, राहुल हमेशा यही चाहते थे कि जब भी वो पार्टी की कमान संभालें तो पार्टी से जुड़े सभी फैसले लेने का अधिकार उन्हीं के हाथ में रहे. यानि इस मामले में वे सोनिया का हस्तक्षेप भी नहीं चाहते. राहुल जब तक कांग्रेस उपाध्यक्ष रहे, पार्टी का चेहरा तो रहे, लेकिन सांगठनिक फैसलों से ज्यादातर दूर ही रहे. राहुल ने बीते साल दिसंबर में कांग्रेस की कमान संभाली तो उसके बाद सोनिया गांधी ने आमतौर पर पार्टी नेताओं से मिलना बंद कर दिया, जिससे कि सबमें यही संदेश जाए कि राहुल ही पार्टी के सर्वेसर्वा हैं. राहुल ने पार्टी की कमान हाथ में आते ही अपने हिसाब से पार्टी में बदलाव के लिए फैसले लेने शुरू कर दिए. इन फैसलों से ये झलक मिली कि सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए जो गलतियां हुईं, उनसे सबक लेते हुए आगे का रास्ता तैयार किया जाए.

मसलन, राहुल ने रणदीप सिंह सुरजेवाला को पहले थोड़े वक्त के लिए ही मीडिया की जिम्मेदारी दी. राहुल ने जब कम्युनिकेशन की आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल, वाकपटुता और उपलब्धता के मापदंडों पर सुरजेवाला को खरा पाया तो मीडिया हेड के तौर पर उनकी सीट पक्की करने में देर नहीं लगाई. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत समझते हुए पहली बार पार्टी में इसका अलग डिपार्टमेंट बनाया. साथ ही राहुल ने शशि थरूर और मिलिंद देवड़ा की शख्सियत के मुताबिक उन्हें प्रोफेशनल कांग्रेस की जिम्मेदारी दे दी. राहुल ने श्रम-मजदूर कांग्रेस का भी गठन कर दिया, जिसका प्रमुख अरविंद सिंह को बनाया गया. अरविंद सिंह लंबे वक्त से हॉकर्स के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं. पार्टी में डेटा की अहमियत समझते हुए इसके लिए भी एक अलग विभाग का गठन हुआ. राहुल ने पार्टी से मछुआरों को जोड़ने के लिए अलग से मछुआरा कांग्रेस का गठन भी किया.

राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद सियासी लिहाज से भी 12 बड़े फैसले लिए जिनके पार्टी में दूरगामी असर हो सकते हैं.  

1. अशोक गहलोत का कद बढ़ाना

राहुल ने पार्टी संगठन महासचिव के पद पर जनार्दन द्विवेदी की जगह अशोक गहलोत को लाकर ये संदेश दिया कि सारे बुजुर्गों को किनारे नहीं किया जा रहा है बल्कि अनुभव और नए खून की मिलीजुली टीम बन रही है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत ने गुजरात के हालिया विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रभारी महासचिव के नाते खासी मेहनत की थी, जो वहां के नतीजों में भी देखने को मिली. ऐसे में गहलोत का कद बढ़ा कर राहुल ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को ये संदेश देने की कोशिश की कि जो बेहतर काम दिखाएगा, उसे इनाम भी दिया जाएगा.

2. सीपी जोशी को हटा गोहिल को बिहार प्रभारी बनाने के मायने

सीपी जोशी को बिहार के प्रभारी पद से हटाकर राहुल ने संदेश देने की कोशिश की कि खराब परफॉर्मेंस पर सजा देने में देर नहीं की जाएगी. राहुल ने जोशी की जगह बिहार का प्रभारी गुजरात के राजपूत नेता शक्ति सिंह गोहिल को बनाया. गोहिल बेशक गुजरात में विधानसभा चुनाव हार गये हों, लेकिन उनको तेज तर्रार नेता माना जाता है. राहुल ने गोहिल को बिहार का प्रभारी बनाकर पार्टी लाइन साफ कर दी कि आरजेडी के साथ गठजोड़ की स्थिति में वो अगड़ी जातियों को थामेगी.  

3. आरपीएन सिंह को झारखंड की कमान

राहुल ने पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह को झारखंड की कमान दी. कमान संभालने के बाद आरपीएन ने जेएमएम और जेवीएम से गठजोड़ किया और वहां से कांग्रेस का राज्यसभा सांसद बन गया. आरपीएन करीब एक दशक पहले झारखंड के प्रभारी सचिव रहे हैं और उनका कार्यकाल बेहतर माना गया था.

4. छत्तीसगढ़ का प्रभार दलित नेता पीएल पुनिया को

छत्तीसगढ़ में इसी साल की दूसरी छमाही में विधानसभा चुनाव होने हैं. प्रदेश में एससी-एसटी की अच्छी खासी आबादी को देखते हुए राहुल ने यहां के प्रभारी के तौर पर दलित नेता पीएल पुनिया पर दांव खेलना बेहतर समझा.

5. यूथ कांग्रेस से आए वेणुगोपाल के जिम्मे कर्नाटक

यूथ कांग्रेस से आए सांसद केसी वेणुगोपाल को कर्नाटक के प्रभारी के तौर पर जिम्मेदारी भी सोच समझ कर दी है. इसके पीछे ये सोच हो सकती है कि कर्नाटक केरल के करीब का राज्य है, ऐसे में वेणुगोपाल वहां की परिस्थितियों को समझने में बेहतर रहेंगे.

6. अनुग्रह नारायण सिंह को उत्तराखंड का प्रभार  

उत्तराखंड में राजपूतों की ज्यादा संख्या को देखते हुए पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से कई बार विधायक रह चुके अनुग्रह नारायण सिंह को प्रभार दिया गया. उत्तराखंड पहले उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा रहा है, इसलिए यहां के मसलों को अनुग्रह नारायण सिंह अच्छी तरह समझ सकते हैं.

7. मणिशंकर अय्यर की छुट्टी

गुजरात चुनाव के वक्त बयानबाजी करने वाले मणिशंकर अय्यर को एक झटके में राहुल ने पार्टी से सस्पेंड कर दिया, जबकि वो गांधी परिवार के खासे करीब माने जाते रहे हैं.

8. बीके हरिप्रसाद की जगह जितेंद्र सिंह

बीके हरिप्रसाद की महासचिव पद से छुट्टी करके राहुल ने अपने करीबी युवा जितेंद्र सिंह को प्रभार दिया. माना जा रहा है कि ये फैसला दिग्विजय के बाद भविष्य में कांग्रेस में राजपूत नेता को उभारने की कोशिश की है. साथ ही इसके जरिए सचिन पायलट के लिए राजस्थान में संगठन की कमान संभालने के लिए रास्ता खुला रखने का भी संदेश है. जितेंद्र सिंह और अशोक गहलोत, दोनों को पार्टी की केंद्रीय राजनीति में बड़े पद दिए जाने के राजनीतिक जानकार यही मायने लगा रहे हैं.

9. जिस राज्य का नेता, वहीं से जाए राज्यसभा

हाल में राज्यसभा के चुनाव में राहुल ने साफ कर दिया कि जिस राज्य से राज्यसभा सांसद चुना जाना है, इसके लिए पहले उसी राज्य के नेताओं को प्राथमिकता मिले. इसी के चलते जनार्दन द्विवेदी, प्रमोद तिवारी, राजीव शुक्ला सरीखे नेता राज्यसभा नहीं जा सके. सिर्फ अभिषेक मनु सिंघवी अपवाद रहे, जिनको पार्टी के लिए केस लड़ने का पुरस्कार बंगाल से मिला, वो भी ममता बनर्जी की मदद से.

10. अपना कोई राजनीतिक सलाहकार नहीं

राहुल गांधी ने अब तक किसी को अपना राजनैतिक सलाहकार नहीं बनाया है. जबकि सोनिया ने अहमद पटेल और उससे पहले अहमद पटेल -अम्बिका सोनी को रखा था. सूत्रों के मुताबिक राहुल नहीं चाहते कि कोई नया पावर सेंटर बने.

11.  एक व्यक्ति, एक पद

राहुल गांधी की कोशिश है कि पार्टी में एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत का पालन किया जाए. राहुल इस पर अधिक से अधिक चल भी रहे हैं. जबकि सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष रहते वक्त प्रणब मुखर्जी, गुलाम नबी आजाद, अजय माकन जैसे तमाम नेता थे जो सरकार और संगठन दोनों में थे. आजाद तो उसी कड़ी में आज भी राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं और पार्टी के यूपी के प्रभारी महासचिव भी. इसीलिए माना जा रहा है कि, राहुल राज में उनको भी एक पद छोड़ना होगा.

12. पार्टी से बाहर के टेलेंट को भी मौका

राहुल राज में पार्टी से बाहर के नए लेकिन टेलेंटेड लोगों को जोड़ने के लिए भी कदम उठाए गए. बोलने में माहिर और कांग्रेस विचारधारा के करीब माने जाने वालों को भी पार्टी के साथ जोड़ने के लिए ये कवायद शुरू की गई. इसके लिए मीडिया विभाग ने राज्य-राज्य जाकर इंटरव्यू लिए. कोशिश ये है कि कांग्रेस से बाहर के लोगों को भी राज्य, जिला स्तर पर पार्टी प्रवक्ता बनाया जाये.

पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल के अब तक के कार्यकाल को देखा जाए तो उन्होंने सियासी हवा के रुख को भांपते हुए अपने फैसले लिए हैं. ये सावधानी बरती गई कि उनके फैसले कार्यकर्ताओं को भी रास आएं. लेकिन इसी दौरान कुछ ऐसे फैसले भी लिए गए जो पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की समझ से परे रहे. जैसे कि यूपी में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को उतारना जिनकी जमानत भी नहीं बच सकी. इसके अलावा बीएसपी से निकाले गए नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी के साथ जोड़ना, अखिलेश यादव की दुखती रग शिवपाल यादव से कांग्रेस का संपर्क करना, इसके बावजूद समाजवादी पार्टी-बीएसपी से महागठबंधन की आस लगाना.  

इसके साथ ही यूथ कांग्रेस और पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई में जान नहीं फूंक पाने को भी राहुल की बड़ी असफलता माना जा रहा है. पार्टी संगठन में राहुल लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव की बहुत दुहाई देते रहे हैं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल भी सोनिया की तरह ही अपनी कांग्रेस वर्किग कमेटी (CWC) चुनेंगे यानि चुनाव के बिना ही.

फिर भी राहुल कई बातों का ख्याल रख रहे हैं.  जल्दी फैसले ले रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में अब तक सीएम का चेहरा वो नहीं तय कर पाए. कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अभी 'धार्मिक यात्रा' पर पैदल भ्रमण कर रहे हैं. 9 अप्रैल को उनकी यात्रा खत्म होगी. माना जा रहा है इसीलिए एमपी का फैसला रुका हुआ है. राहुल नहीं चाहते कि, दिग्गजों को नाराज किया जाए. हालांकि, दिग्गी राजा का विरोधी खेमा राहुल पर दिग्गी के खिलाफ पूरा दबाव बनाए है.

बता दें कि सोनिया के वक्त कई बार ऐसे लोगों को राज्यों का प्रभारी बनाया गया जो उस राज्य की भाषा समझ भी नहीं पाते थे. मिसाल के तौर पर सोनिया के अध्यक्ष रहते हुए केरल के पीसी चाको को दिल्ली का प्रभारी बनाया गया. हालत ये थी कि कई बार दिल्ली के विधानसभा और निगम चुनावों में उम्मीदवारों को अंग्रेजी जानने वाले को साथ ले जाकर चाको से मिलना पड़ता था.

कुल मिलाकर काफी चीजें राहुल, सोनिया के अंदाज से अलग कर रहे हैं, जवाबदेही तय कर रहे हैं. लेकिन अभी भी कई जगह रणनीति सोनिया वाली ही दिखती है. जहां तक बदलाव की बात है तो राहुल की सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उनकी टीम जमीन पर क्या नतीजे देती है और पार्टी कार्यकर्ता कितने जोश के साथ एक्टिव होता है.

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