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Opinion: खुले सिगरेट पर रोक का कानून

एक ओर तो पीएम मोदी देश में लागू सैकड़ों कानूनों को खत्म की पहल कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनके ही मंत्री कुछ नए कानून लाने पर आमदा दिखते हैं. अब स्वास्थ्य मंत्रालय देश में खुले सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाने के लिए कानून में बदलाव करने की बात कर रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

एक ओर तो पीएम मोदी देश में लागू सैकड़ों कानूनों को खत्म की पहल कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनके ही मंत्री कुछ नए कानून लाने पर आमदा दिखते हैं. अब स्वास्थ्य मंत्रालय देश में खुले सिगरेट की बिक्री पर रोक लगाने के लिए कानून में बदलाव करने की बात कर रहा है. एक विशेषज्ञ पैनल ने देश में तंबाकू पर रोक लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की सिफारिश की है जिसमें एक यह भी है कि खुले सिगरेट की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाए. इसी तरह एक और सिफारिश है कि तंबाकू-सिगरेट खरीदने की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 18 से 25 साल कर दी जाए.

इनका उल्लंघन करने वालों को जुर्माना चुकाना पड़ेगा. पैनल की यह सिफारिश वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के कन्वेंशन से प्रभावित है जिसमें यह बात कही गई है कि खुले सिगरेट की बिक्री को निरुत्साहित किया जाए. इसके पीछे तर्क यह है कि बच्चे खुले सिगरेट खरीदने को आकर्षित होते हैं. नई सरकार ने तंबाकू के खिलाफ एक जंग छेड़ी है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि क्या कानून बनाकर कोई बुरी आदत दूर की जा सकी है? शराब का ही मुद्दा ले लीजिए. कई राज्यों ने शराबबंदी की और कड़े कानून बनाए. लेकिन क्या हुआ? महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा वगैरह सभी ने अपने यहां शराबबंदी की जिसका कोई नतीजा नहीं निकला. उलटे अपराध बढ़ गए.

शराब की तस्करी करके पैसे कमाने में लगे लोग बाद में आम किस्म के अपराध करने लगे. इसी तरह शराब खरीदने के लिए उम्र सीमा तय करने का कानून बना. उसका क्या हश्र हो रहा है, यह सभी जानते हैं. अब तक कितने विक्रेताओं या खरीदारों पर इस धारा के तहत कार्रवाई हुई?

दरअसल इस तरह के कानून जब बनते हैं तो इनका कार्यान्वयन बहुत ही कठिन होता है और पुलिस भी कुछ नहीं कर पाती. उलटे यह भ्रष्टाचार का कारण बन जाता है. पुलिसकर्मी वसूली करने लग जाते हैं और फिर यह धंधा चलता रहता है. खुले सिगरेट की बिक्री को सरकार रोकेगी कैसे?

इसे रोकने का काम तो वही पुलिस करेगी जिसके पास पहले से ही काम को बोझ है. क्या सरकार ऐसा कानून बनाने से पहले उससे पूछेगी? आखिर वह कैसे इसे लागू करेगी? देश की हर गली और हर मुहल्ले में सिगरेट बिकता है. इन पर कैसे नजर रखी जाएगी? लाखों लोग सिगरेट-तंबाकू और पान मसाला बेचकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं. अब सरकार पुलिस को उनसे वसूली का अधिकार देने जा रही है. यहां एक बात समझने की है कि बेशक केन्द्र सरकार कानून बना दे, उसका पालन राज्य सरकारों को ही करना है क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का मसला है. कई राज्यों में कानून-व्यवस्था की हालत इतनी खराब है कि उनके बारे में बार-बार चर्चा होती ही रहती है. ऐसे में वहां इस तरह के कानून लागू करने की बात करना बेमानी है. कानून सिर्फ किताबों के लिए नहीं होना चाहिए, उसका पालन भी होना चाहिए. बेहतर होगा कि उस कानून का पालन करवाने वालों से पूछा जाए कि क्या यह संभव होगा. आखिर इसका जिम्मा उन्हें ही उठाना होगा और जब कानून ऐसा हो कि उसका ताल्लुक हर गली तथा हर मुहल्ले से हो तो उसे लागू करने के पहले जरूर सोचना लेना चाहिए.

किसी भी सामाजिक बुराई का इलाज कानून नहीं हो सकता बल्कि जागरूकता से ही उसे दूर किया जा सकता है. जनता को उसके दुखद परिणामों से अवगत करना ही इसका समाधान है. जिस तरह से पटाखों के खिलाफ बच्चों में जागरूकता फैलाई गई उससे हमें सीख लेनी चाहिए. देश के बच्चों में इससे काफी जागरूकता पैदा हुई और बड़े पैमाने पर बच्चे आज पटाखों से दूर रहते हैं. यह बात हर बुरी आदत पर लागू होती है. कानून बनाकर ऐसी समस्याओं का समाधान कतई संभव नहीं है. बेहतर होगा कि सरकार इसकी बजाय एक बड़ा जागरूकता अभियान छेड़े.

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