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ममता बनर्जी ने नक्सलवाद के फाउंडर कानू सान्याल को बनाया अपना 'पोस्टर ब्वॉय'

वाम दलों को सत्ता से उखाड़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी नए विवाद में फंस गई हैं. उनकी सरकार के एक विज्ञापन में नक्सलवाद के संस्थापक कानू सान्याल की तस्वीर नजर आ रही है.

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ममता बनर्जी
ममता बनर्जी

वाम दलों को सत्ता से उखाड़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी नए विवाद में फंस गई हैं. उनकी सरकार के एक विज्ञापन में नक्सलवाद के संस्थापकों में से एक कानू सान्याल की तस्वीर नजर आ रही है.

दरअसल यह जिस योजना का विज्ञापन है उसमें छोटे निवेशकों, मुख्य रूप से किसानों को वित्तीय सुरक्षा देने का वादा किया गया है. करोड़ों के सारधा चिट फंड फर्जीवाड़े के बाद राहत देने के लिए राज्य सरकार ने इस योजना का ऐलान किया था.विज्ञापन में कुछ किसानों की प्रतीकात्मक तस्वीरें लगाई गई हैं. इसमें एक चेहरा कानू सान्याल का भी है. बुधवार को छपे इस विज्ञापन में ममता की तस्वीर भी है.

माफी मांगे ममता सरकार: लेफ्ट
ममता सरकार की इस गलती से लेफ्ट भड़क उठा है. सीपीआई (एम-एल) ने राज्य सरकार से माफी मांगने को कहा है.

सीपीआई (एमएल) की प्रोविजनल सेंट्रल कमेटी के जनरल सेक्रेटरी संतोष राणा ने मेल टुडे से बातचीत में कहा, 'कोई शक की गुंजाइश ही नहीं है कि यह फोटो हमारे नेता कानू सान्याल की है. अपनी गलती के लिए राज्य सरकार को जल्द से जल्द माफी मांगनी चाहिए. यह कोई बच्चों का खेल नहीं है कि आप कानू सान्याल जैसे सम्मानित नेता को अपने विज्ञापन में आम आदमी की तरह पेश करें.'

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'तृणमूल का नहीं है विचारधारा से लेना-देना'
राणा ने कहा कि ममता की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का लेफ्ट की किसी भी विचारधारा से लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा, 'उनका जनांदोलनों में विश्वास नहीं है. वे बस सिंगूर-नंदीग्राम जैसी घटनाओं का फायदा उठाकर सत्ता में आना जानते हैं.'

 कानू सान्याल

हालांकि सरकारी अधिकारी विज्ञापन में कानू सान्याल की तस्वीर होने से मना कर रहे हैं. उनका कहना है कि वह तस्वीर उनके जैसे दिखने वाले दूसरे शख्स की है और यह महज संयोग है.

कौन थे कानू सान्याल?
कानू सान्याल 1960-70 के दशक में नक्सलबाड़ी उभार के अहम नायक थे. 25 मई 1967 को उनके और चारू मजूमदार के नेतृत्व में ही बंगाल में नक्सली आंदोलन शुरू हुआ था. 1969 में व्लादिमीर लेनिन के जन्मदिन पर कोलकाता में उन्होंने सीपीआई (एम-एल) की स्थापना की थी. अगस्त 1970 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 1977 तक वह आंध्र प्रदेश की एक जेल में रहे. केंद्र और प. बंगाल सरकार के दखल के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया.

23 मार्च 2010 को 78 साल की उम्र में उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. उनका शव नक्सलबाड़ी स्थित हतिघिसा गांव के उनके घर में छत से लटका मिला. जिंदगी के आखिरी दौर तक वह सीपीआई (एम-एल) के महासचिव रहे.

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