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जो अपने फायदे की बात बोले वो मोदी नहीं, व्‍यापारियों के सम्‍मेलन में बोले बीजेपी के PM उम्‍मीदवार

नई दिल्ली में कारोबारियों को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी बोले कि देश दिल्ली में चलाने का फैशन बंद होना चाहिए. राज्यों की अपनी ताकत होती है. उन पर भरोसा करना चाहिए. व्यापार की महत्ता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया भर में आपको जो भी भारतीय मिलेंगे. व्यापारी ही मिलेंगे. संबंध इसी के जरिए जुड़े हैं.

नई दिल्ली में कारोबारियों को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में कारोबारियों को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली में कारोबारियों को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी बोले कि देश दिल्ली में चलाने का फैशन बंद होना चाहिए. राज्यों की अपनी ताकत होती है. उन पर भरोसा करना चाहिए.

व्यापार की महत्ता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया भर में आपको जो भी भारतीय मिलेंगे. व्यापारी ही मिलेंगे. संबंध इसी के जरिए जुड़े हैं.

पढ़िए नरेंद्र मोदी और क्या बोले
कैसे बना सुपारी का बाजार

पूर्वजों का कमाल देखिए. कैसी उनकी अर्थ नीति और समाज नीति होती थी. दक्षिण में किसान सुपारी की खेती करते हैं. क्या किसी विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि सुपारी से दिल दिमाग को क्या फायदा होता है. पूर्वजों ने क्या दिमाग लगाया. सुपारी की हेल्थ वैल्यू तो है नहीं. तो उन्होंने इसे पूजा में महत्वपूर्ण स्थान दे दिया. बड़ा मार्केट खड़ा कर दिया. ये विजन चाहिए.

खुर्शीद पर तंज किया
(मोदी को नपुंसक बताने वाले विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद पर परोक्ष हमला करते हुए मोदी बोले) हमारे देश का विदेश मंत्रालय पुराने ढर्रे से काम कर रहा है.इसका मूल काम ट्रेड एंड कॉमर्स है. मगर ये अभी भी पुराने ढंग की डिप्लोमेसी पर अटका है. ट्रेड डिप्लोमेसी पर नहीं सोच रहा है.

रूस का किस्सा
अस्ट्राखान एक छोटा स्टेट है रूस में. अटल जी के समय, गुजरात का इस राज्य से अनुबंध हुआ. जब मैं पहली बार गया तो अहमदाबाद से दिल्ली, फिर मास्को, फिर वहां. चालीस पचास घंटे लगे.दूसरी बार चार्टर प्लेन लेकर गया. तो तीन घंटे में पहुंच गया. यानी दूरी बहुत कम है. अगर कम करना चाहें तो.

खैर, जब गया तो देखा वहां, कोई भी अच्छी दुकान होती थी, तो उसका नाम होता था ओखा. मैं हैरान, इतनी ओखा दुकानें हैं. ये ओखा तो मेरे गुजरात का एक पोर्ट था, द्वारका के पास. आज भी अष्ट्राखान में दुकानदार ओखा नाम रखता है, तो उसका माल ज्यादा बिकता है. ये प्रतिष्ठा किसने बनाई, उस समय के व्यापारियों ने बनाई. जो सदियों बाद तक चल रही है.

हम आएंगे और पहले गड्ढे भरेंगे
आप जानते हैं, जब भी हम आएंगे. भले ही साठ दिन बाकी हो. तब साठ साल के गड्ढे होंगे जी, हमारा पहला काम तो वो गड्ढे भरने में जाने वाला है. फिर जो भरते भरते हम आगे बढ़ेंगे. लेकिन हम इस बात में यकीन करते हैं कि आगे बढ़ेंगे.

ऑनलाइन ट्रेड से डरे न कारोबारी
पता नहीं ये बात बोलने से राजनीतिक फायदा होगा या नहीं. अपने फायदे की बात बोले तो नरेंद्र मोदी नहीं. अपने फायदे के लिए पैदा नहीं हुआ. आप चाहें या न चाहें. वैश्विक चैलेंज से डरने की जरूरत नहीं. इसे हम मौकों में बदलेंगे. ऑनलाइन ट्रेड होगा तो ये नहीं होगा, तो हम मर जाएंगे. क्या बात करते हो. वो 10 कदम जाएंगे, तो 15 जाएंगे. उन्हें मालूम नहीं हमारे पास क्या है. सरकार से आप ये मांग करिए कि व्यापारी की ग्लोबल चुनौतियों से लड़ने के लिए क्षमता कैसे बढ़े. सरकार उस पर ध्यान करे.

वर्चुअल स्टॉक के बारे में सोचें
हमारे ही बच्चे तो दुनिया में आईटी लेकर गए हैं. हमें इसे स्वीकार करना होगा. देखिए साहब, अब वो दिन दूर नहीं. छोटे नगर सोच लीजिए.उसका भी जो खरीदार होगा. आप चाहें या न चाहें, वो भी अब ब्रैंडेड चीजें खोज रहा है. अब आप ब्रैंड की एजेंसी लोगे, तो उनके दस तरह की कंडिशन. लेकिन आप उसके साथ करार करके वर्चुअल स्टॉक रख सकते हैं. ग्राहक आए, तो दिखाओ कंप्यूटर पर सब चीजें और बताओ कि दो दिन में डिलीवरी हो जाएगी. इसके लिए कितना बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए.

हम भागने का नहीं, भिड़ने का व्यापार करें. सेना के जवान से ज्यादा साहस व्यापारी रखता है. रिस्क टेकिंग कैपिसिटी चाहिए इसके लिए. छोटा व्यापारी रोजी कहां से कमाएगा, जब सामान्य व्यक्ति की खरीद शक्ति बढ़ेगी. इस पूरे चक्र में सरकार की तिजोरी सबसे बाद आती है. रुपया आता है, तो सबसे पहले व्यापारी के पास जाता है. इस लिंक को जीवंत बनाना होगा.

कैसे छोटा हुआ वैट फॉर्म
मैं सुधार के पक्ष का व्यक्ति हूं. अभी कुछ व्यापारी आए. बोले वैट का फॉर्म इतना लंबा, हम थक जाते हैं. अब हमें तो पता नहीं कि वैट का फॉर्म कैसा. मैंने अफसरों को बुलाया. पूछा क्यों ऐसा करते हैं. सात दिनों के भीतर, सात-आठ पेज के फॉर्म को तीन पेज का बना दिया. इतना ही नहीं, उसको ऑनलाइन भी कर दिया. और फिर व्यापारियों को कहा. इसको कम करना है, तो सुझाव दो. इसका मतलब ये हुआ मित्रों. लोगों की सहभागिता से हम नीतियों को सरल कर सकते हैं.

सरकार को लगता है बाकी सब चोर हैं
देश ऐसे नहीं लग सकता. सरकार हो या समाज हो, व्यापारी या व्यवस्था, एक दूसरे पर भरोसा होना चाहिए. उसके बाद कमियां आती हैं, तो कानून है. मैं जो शासन व्यवस्था में कायाकल्प की बात कर रहा हूं वह इस सोच से शुरू होता है. मैं यकीन से कहता हूं. कोई कारण नहीं कि देश दयनीय हालत में रहे. ये समृद्ध होने, भव्य और दिव्य होने के लिए है.

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