इस वर्ष राजधानी दिल्ली सहित देश के कई शहरों में हुए सिलसिलेवार बम-धमाकों ने लोगों का अमन-चैन छीन लिया है. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए और कड़े कानूनों और पुख्ता सुरक्षा-व्यवस्था की बात की जा रही है. दूसरी ओर मुंबई में अभी भी बिना जरूरी कागजात के सिर्फ कमीशन की रकम लेकर एक सुरक्षित ठिकाना दिलाने का खेल चल रहा है. कमीशन के इस खेल में एजेंट आतंकवादियों को भी पनाह दिलवा रहे हैं.
वर्ष 1993 के बाद से मुंबई में जितने भी बम धमाके हुए हैं, उनके सुराग पुलिस को मुंबई के मीरा रोड इलाका से ही मिले. हर बार संदिग्ध आरोपियों की तलाश में मुंबई पुलिस और खुफिया एजेंसियां इसी इलाके में छापे मारती रही हैं. इसलिए 'आजतक' ने मुंबई के इसी इलाके में यह जानने की कोशिश की कि यहां ठिकाना बनाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.
यहां किराए का फ्लैट लेने के लिए आज तक की टीम ने मीरा रोड की एक रियल इस्टेट एजेंसी से संपर्क साधा. एजेंसी ने सलीम नाम के एक एजेंट का नंबर दिया. सलीम से मुलाकात हुई, तो उसने पलक झपकते ही दिखाया दिया गोविंदनगर इलाके में बहुमंज़िली इमारत का एक फ्लैट और शुरू हो गई किराए के फ्लैट की डीलिंग. फ्लैट का रेट और पेशगी तय होने के बाद बारी आई एग्रीमेंट की. सलीम नाम के एजेंट को साफ-साफ बता दिया गया कि हमारे पास अपनी पहचान साबित करने के लिए कोई डॉक्युमेंट नहीं है. इस पर सलीम ने कहा कि पांच सौ रुपए एग्रीमेंट का दे दें. बाकी सब मेरे ऊपर छोड़ दें.
सलीम ने टोकन मनी के तौर पर आठ सौ रुपये लिए और फोन पर मकान मालिक से बात करके डील पक्की कर दी. इस डील ने यह भी साबित कर दिया कि यहां किराएदार की पहचान मायने नहीं रखती. किराए पर फ्लैट दिलाने वालों को सिर्फ अपने कमीशन से मतलब है. कमीशन मिले, तो वे किसी आतंकवादी को भी किराए का फ्लैट दिलवा सकते हैं. इन्हें अपनी सेटिंग पर बहुत भरोसा है. इन्हें मालूम है कि वो किराएदार का नाम-पता जो भी बता देंगे, पुलिस उसे आंख मूंदकर सही मान लेगी.
{mospagebreak}मुंबई के मीरा रोड इलाके में प्रॉप्रटी डीलर्स और रियल इस्टेट एजेंट्स का जाल फैला है. जगह-जगह दुकानें खोलकर बैठे ये दलाल कमीशन के चक्कर में सिर्फ ठिकाना मुहैया नहीं कराते, बल्कि ठिकाने के साथ ही दे देते हैं शराफत का सर्टिफिकेट. ये किसी का भी नाम-पता जाने बिना उसे किराए पर मकान दिलवाते हैं और फर्ज़ी कागजात तैयार करके उसे पुलिस की निगाह से भी बचाने का इंतज़ाम कर देते हैं. मीरा रोड के गोविंदनगर में अगर सलीम जैसे एजेंट हैं, तो इसी इलाके में है सुपर इस्टेट एजेंसी. पुलिस वाले की मौजूदगी में फ्लैट का किराया बताने वाले एजेंट ने अभी तक हमारी टीम से नाम-पता पूछना ज़रूरी नहीं समझा. यहां भी फ्लैट के किराए को लेकर सौदेबाज़ी तो हुई, लेकिन एजेंट ने पहचान पूछने की हिमाकत नहीं की.
इस इलाके में कई विदेशी भी संदिग्ध हालत में घूमते टहलते नज़र आए. एजेंट ने बताया कि यहां नाइजीरिया के कई लोग नाजायज़ ढंग से रह रहे हैं. एजेंट ने बड़ी शान से यह भी बताया कि यहां किराए पर फ्लैट लेने वालों का आका वही है. इस एजेंट ने दावे के साथ कहा कि वह किराएदारी के सारे कागजा़त खुद तैयार करवा लेगा. उसने दावा किया कि वह किसी नेता से लेटर लिखवा लेगा कि ये हमारी जान पहचान के हैं. अब यह बताने की ज़रूरत नहीं रह जाती है कि आखिर मुंबई में हर धमाके के बाद पुलिस के हाथ लगने वाले सुराग मीरा रोड की तरफ ही क्यों जाते हैं.
होटल सस्ता हो या फिर थ्री स्टार. मुंबई में दोनों के तौर-तरीके एक जैसे ही हैं. यहां जो चाहे, जब चाहे आ सकता है और अपना ठिकाना बना सकता है. अब जब होटल में आने वाले से उसकी पहचान नहीं पूछी जाती, तो भला ये कौन पूछेगा कि यहां आने वाले का मकसद क्या है.
किसी अनजान आदमी के लिए किसी भी शहर में सबसे आसान ठिकाना होता है कोई होटल. मुंबई में पिछले आतंकवादी हमलों और दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बाद होटलों में ठहरने वालों की निगरानी कैसे की जा रही है, यह जानने के लिए भी आजतक की टीम मुंबई के एक थ्री स्टार होटल में पहुंची.
{mospagebreak}इस होटल में आने के बाद एहसास हुआ कि यहां किसी के भी लिए पनाह लेना कितना आसान है. होटल के बुकिंग काउंटर पर बैठे कर्मचारी को सिर्फ पैसों से मतलब है. पैसा कोई हिंदुस्तानी दे, पाकिस्तानी दे या फिर कोई भी. होटल का स्टाफ यहां ठहरने वालों की पहचान नहीं पूछता. उसने आज तक की टीम से भी पासपोर्ट या कोई दूसरा पहचान पत्र दिखाने के बारे में पूछा तक नहीं. उसका माथा हमारे इस सवाल पर भी नहीं ठनका कि होटल में कोई आदमी कितने दिन तक रुक सकता है.
प्रॉपर्टी डीलरों का यह खेल बेहद ख़तरनाक है. वे अपने कमीशन के चक्कर में बिना पहचान पूछे लोगों को किराएदार बना रहे हैं. ऐसे ही किसी एजेंट की बदौलत मुंबई से सटे नालासोपारा इलाके में कई साल छिपा रहा 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट का गुनहगार करीमुल्लाह. मुंबई धमाकों के बाद करीमुल्लाह पाकिस्तान भाग गया था. मुंबई पुलिस ने उसे मोस्ट वांटेड घोषित करके यह सोच लिया कि करीमुल्लाह शायद अपने आका दाऊद इब्राहिम के साथ ही वापस आएगा. लेकिन, ऐसा हुआ नहीं. करीमुल्लाह खुफिया एजेंसियों की आंखों में धूल झोंककर फिर मुंबई आ गया. कई साल से वह नालासोपारा के इसी मकान में रह रहा था.
मुंबई का मोस्ट वांटेड करीमुल्लाह मुंबई पुलिस की नाक के नीचे रह रहा था और पुलिस ने उसे एन ओ सी भी दे रखा था. मुंबई में किराएदारों के पुलिस वेरिफिकेशन की पोल खोलने वाली इस घटना के बावजूद ना तो फर्जी दस्तावेज़ तैयार करवाने वाले रियल इस्टेट एजेंटों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और ना ही इस्टेट एजेंटों को ये ख्याल आया कि वो अपनी जेब भरने के चक्कर में पूरे मुंबई की आस्तीन में सांप पाल रहे हैं. आजतक ने पहले भी आगाह किया था कि मुंबई आतंकवादियों के निशाने पर है. इस स्टिंग ऑपरेशन का मकसद भी पुलिस, खुफिया एजेंसियों और मुंबई के लोगों को अलर्ट करना ही है कि उनके पड़ोस के किसी मकान या होटल में आतंकवादी बड़ी आसानी से अपना अड्डा बना सकते हैं.
आमची मुंबई. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ और आतंकवादियों का सबसे पसंदीदा ठिकाना. आतंकवादी मुंबई को बार-बार निशाना बना रहे हैं. लेकिन बम धमाकों की आवाज़ से भी इस शहर के पहरेदारों की नींद नहीं खुली है. पैसों की चमक में लोग बारूदी राख को दबा देते हैं. मुंबई में दौलत की खनक में गुम हो जाती है धमाकों की गूंज, ये आप देखेंगे तो दंग रह जाएंगे.