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न्यायमूर्ति कपाड़िया ने भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ ली

उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश एस एच कपाड़िया को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने आज देश के 38वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई.

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उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश एस एच कपाड़िया को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने आज देश के 38वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई. राष्ट्रपति भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उनके कैबिनेट के सहयोगी, निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन और अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे. न्यायमूर्ति कपाड़िया इस पद पर 29 सितम्बर वर्ष 2012 तक रहेंगे.

वह पांच न्यायाधीशों वाली उस संवैधानिक पीठ से जुड़े रहे हैं जिसने नौंवी अनुसूची में शामिल कानून की न्यायिक पुनरीक्षा का ऐतिहासिक फैसला दिया था. न्यायमूर्ति कपाड़िया कर कानूनों के विशेष जानकार हैं. वह कड़े न्यायिक अनुशासन के लिए जाने जाते हैं.

वह ऐसे समय पदभार ग्रहण कर रहे हैं जब भारतीय न्यायपालिका भ्रष्टाचार संबंधी विवादों में घिरी है और न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पदोन्नति पर आंतरिक तंत्र की कथित विफलता का सामना कर रही है.

न्यायमूर्ति कपाड़िया उच्चतम न्यायालय में 18 दिसम्बर वर्ष 2003 से हैं. इस दौरान वह 771 फैसलों में सम्बद्ध रहे. भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में उनका 28 महीने का कार्यकाल चुनौतीपूर्ण रहेगा क्योंकि न केवल उच्चतम न्यायालय बल्कि उच्च न्यायालय एवं निचली अदालतों में भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं जिनकी संख्या कम करने की जररत है.{mospagebreak}

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न्यायमूर्ति कपाड़िया की असली परीक्षा तब होगी जब वह यह तय करेंगे कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है या नहीं है क्योंकि न्यायमूर्ति बालाकृष्णन लगातार कहते रहे कि उनके कार्यालय को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. यह मामला इसलिए भी खासा महत्व रखता है क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति बालाकृष्णन के रख को खारिज कर दिया था जिसके बाद उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री ने उच्चतम न्यायालय में अपील की थी.

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी आर कृष्णा अय्यर को तीन मई को लिखे एक पत्र में न्यायमूर्ति कपाड़िया ने कहा था कि उनके पास जो सम्पत्ति है, वह एकनिष्ठा है और ‘समावेशी विकास’ का लक्ष्य हासिल करने करने के लिए संवैधानिक बाध्यताओं को पूरा करने की आशा जताई थी.

उन्होंने कहा था, ‘‘मैं एक गरीब परिवार से आता हूं. मैंने एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में अपने करियर की शुरआत की और मेरे पास एकमात्र सम्पत्ति एकनिष्ठा है.’’ उन्होंने कहा था, ‘‘यहां तक कि उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश के तौर पर मैंने अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान का इस्तेमाल आदिवासियों और कामगारों समेत दबे-कुचले वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए किया.’’

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