इस साल मार्च में इंडियन फॉरेस्ट (अमेंडमेंट) बिल 2019 का मसौदा वितरित किया गया, जिसका उद्देश्य 2006 के वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों और वनवासियों को दिए गए अधिकारों पर राज्य सत्ता को फिर से स्थापित करना है.
यह विधेयक फॉरेस्ट से जुड़ी नौकरशाही को सशक्त करने का प्रयास करता है, जिसकी सर्वोच्चता छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र से उत्पन्न वामपंथी उग्रवाद के नये दौर को भड़काती है. इसके अलावा इस कानून की सर्वोच्चता आदिवासियों के गुस्से और 'ऐतिहासिक अन्या' को दूर करने के लिए लाए गए वनाधिकार कानून के तहत मिले उनके पारंपरिक अधिकारों से उन्हें वंचित करती है.
भारतीय वन अधिनियम 1927 (IFA) के माध्यम से औपनिवेशिक सरकार ने वन संसाधनों पर अधिक से अधिक शक्ति हासिल करने की कोशिश की थी. अब इस नये कानून के माध्यम से केंद्र सरकार उससे भी आगे जाकर अपने अधिकारों को मजबूत करना चाहती है. यह विधेयक भारतीय वन अधिनियम 1927 की जगह लेगा.
नौकरशाही की बढ़ी भूमिका
इस विधेयक का मसौदा संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) के माध्यम से 'ग्रामीण वनों' का प्रबंधन फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को देता है. हालांकि, ग्रामीण वन की अवधारणा मूल IFA में मौजूद है, लेकिन FRA ने वन भूमि और वन संसाधनों पर वनवासी समुदायों के अधिकारों की पहचान करने में सभी मौजूदा कानूनों को निरस्त कर दिया. वनवासियों की ग्राम सभा के माध्यम से वनों का संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार उन्हें सौंपा गया और इस तरह JFMC को गैरजरूरी बना दिया.
इसमें कहा गया है कि अगर कोई ग्रामीण जंगल आदिवासी समुदाय संबंधित है, तो लकड़ी और अन्य वन उपज का उपयोग, चारागाह पर अधिकार और इन वनों का संरक्षण और प्रबंधन 'वन विभाग के परामर्श सेट होगा. (क्लॉज 22).
इसके अलावा, यह विधेयक फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को वन अधिकारों के बारे में फैसला करने का अधिकार देता है और ऐसे वनों को 'आरक्षित वन' घोषित करने के लिए मुआवजे का भुगतान करके व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को खत्म करने की पॉवर देता है. क्लॉज 26 में यह प्रावधान है कि आरक्षित वन में आग लगने या वन उपज की चोरी या मवेशियों द्वारा चरने के मामले में, चारागाह या वन उपज के सभी अधिकार खत्म कर दिए जाएंगे. इसी के साथ ये प्रावधान फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को वन अधिकारों को समाप्त करने के लिए वीटो पॉवर देते हैं.
सशस्त्र फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी और क्षतिपूर्ति
नए विधेयक में एक नये प्रावधान (क्लॉज 66) के तहत फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को वन अपराध की जांच करने के लिए फायद आर्म्स का उपयोग करने और संदेह के आधार पर ग्राम सभा को सूचित करके किसी भी परिसर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई है.
इससे भी बदतर यह है कि यह विधेयक सशस्त्र बलों के लिए 'अशांत क्षेत्रों' में लागू सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम 1958 के तहत ब्यूरोक्रेसी को असीमित अधिकार देता है. इसके तहत अगर वे कोई ज्यादती या गलत काम करते हैं तो यह कानून उन्हें अभियोजन से सुरक्षा देता है. राज्य की पूर्व अनुमति के बिना वन अधिकारियों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. इसके लिए किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के लिए सशर्त अनुमति दी जाएगी.
विधेयक कहता है कि ब्यूरोक्रेसी को यह सुरक्षा 'वन अपराध को रोकने के लिए' दी जा रही है. यह विशेषाधिकार कुछ विशेष प्रकार के लोक सेवकों जैसे न्यायाधीशों और सशस्त्र बल कर्मियों के लिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत निर्धारित सुरक्षा के अतिरिक्त होगा.
क्लॉज 11 (3) के तहत वन निपटान अधिकारी को वन भूमि अधिग्रहित करने के लिए 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत 'कलेक्टर के रूप में' कार्य करने का अधिकार देता है. इसके अलावा, क्लॉज 84 कहता है कि इस तरह के अधिग्रहण को 'सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आवश्यक समझा जाएगा.' हालांकि, यह सार्वजनिक उद्देश्य कहीं भी परिभाषित नहीं है.
आदिवासियों को और कमजोर किया
क्लॉज 66 एक फॉरेस्ट अपराधी यानी वन के प्रति कोई अपराध करने वाले को आतंकवादी की तरह मानता है. यह कानून आरोपी पर यह बोझ डालता है कि वह खुद को बेगुनाह साबित करे. जबकि बाकी मामलों में मौजूदा आपराधिक कानून अभियोजन पर अपराध साबित करने का दबाव डालता है. यह कानून किसी एक व्यक्ति की गलतियों के लिए उस व्यक्ति अलावा पूरे 'वनवासी समुदाय' या राज्य में कानूनी तौर पर पंजीकृत संगठन को दोषी ठहराता है, लेकिन इसे लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं देता है.
यहां तक कि यह कानून राज्य सरकार को किसी पर दर्ज केस वापस लेने का अधिकार भी नहीं देता. (1976 में वन मामलों को समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था). यह अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को होगा. विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि राज्य सरकारें राजनीतिक लाभा के लिए दर्ज मामलों को वापस ले लेती हैं. इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए क्योंकि इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं. इस तरह का लचीलापन वन क्षेत्र के विनाश का कारण है. केंद्र सरकार के पास राज्यों के अधिकारों को खत्म करने और वन प्रबंधन में हस्तक्षेप करने की भी शक्ति होगी और इस संबंध में ज्यादातर अपराधों को गैरजमानती बना दिया गया है.
विशेषज्ञों की आशंका
आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले और कानून के अध्यापक प्रो. श्रीधर आचार्युलु कहते हैं कि यह विधेयक वनवासियों को सशक्त बनाने के बजाय फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी की शक्तियों को बढ़ाता है और इस तरह FRA ने जो अधिकार दिए थे, उसे यह छीनता है. फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को वन अधिकारों की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने का अधिकार होगा. यह ग्राम सभा और अन्य (जिला और उप-जिला स्तर) समितियों के अधिकारों और भूमिकाओं के मद्देनजर पूरी तरह से विरोधाभासी है.
वे हैरानी जताते हुए कहते हैं, 'वर्षों पुरानी भूमि समस्याओं के पीछे फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी ही असली कारण है और यही असली खलनायक है. उनकी शक्ति को और क्रूर बना दिया गया है. अब आदिवासी कौन सा लाभ ले सकेंगे?'
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च कांची कोहली का कहना है कि विधेयक में ऐतिहासिक झगड़े का उदाहरण दिया गया है कि जंगलों को कैसे और किसके द्वारा शासित किया जाना चाहिए. वे कहती हैं, 'वन अधिकार अधिनियम ऐतिहासिक रूप से अलग-थलग पड़ चुके अधिकारों को मान्यता देने के लिए लाया गया था. FRA भी समुदाय आधारित संरक्षण के लिए जगह बनाने का एक प्रयास था. यह मसौदा वन विभाग के नियंत्रण को फिर से हासिल करने का एक प्रयास है. हालांकि यह दुरुपयोग के मामलों में उचित हो सकता है, लेकिन इसका सामान्यीकरण FRA द्वारा दिए गए लोकतांत्रिक वन प्रशासन को पहले की ही तरह बना देगा.'
विडंबना यह है कि विधेयक की प्रस्तावना में वनवासियों के संरक्षण और कल्याण के लिए लोगों की भागीदारी की बात भी कही गई है. यह विधेयक राष्ट्रीय स्तर पर विकास की आकांक्षाओं और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और इसके व्यापक उद्देश्यों के लिए वन-आधारित पारंपरिक ज्ञान को मजबूत करने का समर्थन भी करता है.