ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि देश में कोर्टरूम बनाने की गति बेहद धीमी है. इसके पीछे बजट की कमी भी एक कारण है. कोर्टरूम की कमी की वजह से भी जजों की भर्ती प्रभावित होती है. जजों की भर्ती प्रभावित होने से लंबित मामले निपटाने में समय लगता है.
11 राज्यों में जजों की तुलना में कोर्टरूम 10 फीसदी से कम
देश के 30 राज्यों में से 11 राज्य ऐसे हैं जहां स्वीकृत जजों के पदों की तुलना में कोर्टरूम 10 फीसदी से कम है. देश के करीब 24 राज्यों में जजों की तुलना में कोर्टरूम कम हैं. छोटे और बड़े अदालतों में मामलों में औसतन विलंब 2.7 से लेकर 9.5 साल है. सिर्फ ओडिशा और त्रिपुरा के हाईकोर्ट और अधीन न्यायलयों में 100 फीसदी मामलों का निपटारा किया गया. बिहार के अधीनस्थ न्यायालयों में दर्ज 39.5 फीसदी मामले 5 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं.
इन 6 राज्यों की पुलिस में महिलाओं की भागीदारी 33% होने में लगेंगे 300 साल
उच्च न्यायालयों में स्वीकृत 4 जजों के पद पर 1 पद खाली
देश के 18 बड़े और मध्यम आकार के राज्यों के हाईकोर्ट में जजों के स्वीकृत चार पदों में से एक पद खाली है. यानी हाईकोर्ट में जजों के 25 फीसदी पद खाली हैं. पूरे देश की जीडीपी का सिर्फ 0.08 फीसदी हिस्सा ही न्याय पालिका की व्यवस्थाओं के लिए खर्च होता है. देश के ज्यादातर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने बजट का सिर्फ 1 फीसदी या उससे कम हिस्सा ही न्यायपालिका में खर्च करते हैं. सिर्फ दिल्ली ही इकलौता राज्य है जहां की सरकार न्यायपालिका पर अपने बजट का 1.9 फीसदी हिस्सा खर्च करती है.
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-19: इंसाफ दिलाने में महाराष्ट्र नंबर-1, यूपी सबसे खराब राज्य
देश में 50 हजार की आबादी पर एक जज नियुक्त
न्यायपालिका में नई भर्तियों की बेहद जरूरत है. अगर 2016-17 के सरकारी आंकड़ों को खंगाले तो पता चलेगा कि देश के एक भी हाईकोर्ट या अधीनस्थ अदालत ऐसे नहीं हैं जहां सभी पद भरे हुए हों. देश के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हर 50 हजार की आबादी पर एक अधीनस्थ जज तैनात हैं.
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्थाएं
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट टाटा ट्रस्ट्स, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, कॉमन कॉज, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिटिव, दक्ष, टीआईएसएस-प्रयास और विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने मिलकर बनाया है.