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पुलिस की इमेज खराब करने वाले 6 विवादित एनकाउंटर

सवाल है कि क्या वाकई प्रधानमंत्री की इस दलील में दम है कि पुलिस की खराब छवि के लिए फिल्में जिम्मेदार हैं. वैसे तो देश की पुलिस में तमाम खामियां हैं, लेकिन यहां पढ़िए कुछ चुनिंदा एनकाउंटरों के बारे में जिनकी वजह से पुलिस की इमेज बदरंग हुई.

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Prime Minister Narendra Modi
Prime Minister Narendra Modi

गुवाहाटी में 30 नवंबर को आयोजित पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस की खराब छवि के लिए फिल्मों को जिम्मेदार ठहराया था. प्रधानमंत्री ने कहा था कि फिल्मों ने आम आदमी के जेहन में पुलिस की एक बहुत खराब छवि बना दी है. सवाल है कि क्या वाकई प्रधानमंत्री की इस दलील में दम है कि पुलिस की खराब छवि के लिए फिल्में जिम्मेदार हैं. वैसे तो देश की पुलिस में तमाम खामियां हैं, लेकिन यहां पढ़िए कुछ चुनिंदा एनकाउंटरों के बारे में जिनकी वजह से पुलिस की इमेज बदरंग हुई.

1. इशरत जहां (2004)
मुंबई से ताल्लुक रखने वाली 19 साल की लड़की इशरत जहां को 3 अन्य के साथ मुठभेड़ में मार गिराया गया. पुलिस फाइल के मुताबिक 15 जून 2004 को इशरत के साथ जीशान जोहार, अमजद अली राणा और प्रनेश पिल्लई भी मुठभेड़ में मारे गए. माना जा रहा था कि ये चारों लश्कर ए तैयबा से जुड़े हुए थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश में जुटे थे. घटना के बाद हुई जांच में खुलासा हुआ कि इशरत के साथ चारों की हत्या जान बूझकर की गई थी. गुजरात सरकार ने इस जांच रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी. 2013 में इशरत जहां एनकाउंटर को साजिश करार देते हुए सीबीआई ने अहमदाबाद कोर्ट में पहली चार्जशीट पेश की.

2. सोहराबुद्दीन शेख (2005)
सोहराबुद्दीन शेख अंडरवर्ल्ड से जुड़ा अपराधी था, जिसकी 26 नवंबर 2005 को पुलिस कस्टडी में मौत हुई. मौत के दिन सोहराब अपनी पत्नी के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रहा था. इस बीच गुजरात पुलिस की एटीएस शाखा ने बस को रुकवाया और सोहराब को उसकी बीवी के साथ उतार लिया. तीन दिन बाद शेख अहमदाबाद के बाहर एक कथित एनकाउंटर में मारा गया. शेख के भाई के हस्तक्षेप और मीडिया के दबाव के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. जांच के बाद कथित एनकाउंटर में संलिप्त गुजरात के कई पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई और कइयों को जेल की सजा हुई.

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3. तुलसीराम प्रजापति (2006)
तुलसीराम प्रजापति सोहराबुद्दीन शेख का एसोसिएट था. जो शेख के बाद पुलिस कस्टडी में मारा गया. आरोप लगाए गए कि तुलसीराम, सोहराबुद्दीन के मारे जाने का चश्मदीद था. प्रजापति दिसंबर 2006 में मारा गया. 2011 में सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू की.

4. बटला हाउस एनकाउंटर (2008)
बटला हाउस एनकाउंटर 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के जामियानगर में हुआ. एनकाउंटर के दौरान दो संदिग्ध मारे गए, जबकि दो गिरफ्तार हुए. इस घटना के बाद प्रशासन के खिलाफ जोरदार विरोध के स्वर फूट पड़े. खासतौर पर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों की ओर से. कई सारी राजनीतिक पार्टियों ने इस घटना की जांच की मांग की. 2009 में मानवाधिकार आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दे दी.

5. अंसल प्लाजा दिल्ली (2002)
शायद सभी एनकाउंटरों में जो सबसे विवादित रहा, उसमें साल 2002 में दो आतंकी दिल्ली के अंसल प्लाजा के बेसमेंट में मारे गए थे. इस मामले में होमियोपैथिक डॉक्टर हरिकृष्ण (जो खुद को घटना का गवाह बताते थे) ने दावा किया कि एनकाउंटर फर्जी था. बाद में उन्होंने कुछ नामों की सूची जारी की और कहा कि इस घटना के पीछे यही लोग हैं. हालांकि आश्चर्यजनक रूप से दूसरे चश्मदीद गवाहों ने हरीकृष्ण के दावों पर सवाल नहीं उठाए. इसके बाद के वर्षों में हरिकृष्ण कुछ समय के लिए गायब हो गए और बाद में अपने दावों पर कायम नहीं रह पाए.

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6. रामनारायन गुप्ता उर्फ लाखन भैया (2006)
कथित रूप से अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन के गुर्गे रहे रामनारायन गुप्ता मुंबई के उपशहरी इलाके वर्सोवा के पास मुंबई पुलिस के हाथों एक एनकाउंटर में मारे गए. लाखन भैया के नाम से मशहूर रहे गुप्ता को शक के आधार पर पुलिस ने नवी मुंबई से 11 नवंबर 2006 को उठाया था. बाद में उसी दिन उन्हें मार दिया गया. गुप्ता की मौत के बाद कोर्ट पहुंचे उनके भाई की कोशिशों से इस मामले की जांच के लिए कोर्ट इंक्वायरी शुरू हुई. इसके बाद आश्चर्य जनक रूप से कथित एनकाउंटर में शामिल रहे 22 पुलिस वालों की गिरफ्तारी हुई.

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