होली वाकई बड़ी राहत लेकर आई. कई साल बाद झांसी रेलवे स्टेशन से बस अड्डा के लिए टेम्पो पकड़ा. इधर पड़ गई चुनावी लत के कारण बैठते ही ऑटो वाले से पूछा क्या माहौल है. उसने सटीक दर्शन दिया- अभी पूरा महीना भर है. बस, ये आधा वाक्य दिमाग में राजनीतिक उठापटक को शांत करने के लिए संजीवनी सा काम करता रहा होली की दोज तक. बस पकडक़र झांसी से खजुराहो जाने वाले हाइवे पर आगे बढ़े तो पलाश के पेड़ नजर आए लेकिन उनमें दहकते पलाश के फूल नदारद थे. भरे फागुन में ये सुर्ख रंग क्या उड़ा जैसे बुंदेलखंड का सुहाग उजड़ गया है. जब से पलाशमयी प्रकृति को देखना शुरू किया है, ऐसा पहली बार हुआ कि पलाश नहीं थे.
पिछले साल इसी मौसम की ओरछा की दृश्यावली आंखों पर आज तक कब्जा किए है. मन तो उससे आगे का मंजर देखने की आस लगाए बैठा था. पूछा तो पता चला कि बिन फूले पलाश उसी बेमौसम बारिश और ओलों का असर हैं, जिन्होंने रबी की फसल की बैंड बजा रखी है. इन ओलों ने पलाश के बौर तबाह कर दिए और खेतों में खड़ी फसल को धराशायी कर दिया. घर पहुंचा तो अखबारों में किसानों की खुदकुशी की खबर पढ़ी. वैसे इस तरह की खबरें पढ़ने की आदत सी हो गई है, और सच कहूं तो इनके प्रति हृदय कठोर सा हो गया है. महोबा से एक खबर थी कि एक किसान खेत पर गया और वहां चौपट फसल देकर उसकी तबीयत ऐसी बिगड़ी कि फिर अस्पताल से उसकी मैयत ही उठी.
लेकिन हमको क्या? हमारा वेतन तो समय से बैंक में आता है. भाई-बंद सब होली पर घर आए थे. धीरे-धीरे रंग जमने लगा. हारमोनिया, ढोलक, झांझ मजीरा बाहर निकल आए और फाग गबी. हम तो वैसे भी उस देश के हैं जहां क्या फाग और क्या दिवारी दोनों ही पहले गाए जाते हैं और उसके बाद खेले या मनाए जाते हैं. सच तो ये है कि ये त्योहार से ज्यादा गायन की स्वतंत्र लोक विधाओं के तौर पर उभरे हैं. मजे की बात ये भी है कि दोनों गीत विधाएं धर्म से जुड़ी होने के बावजूद अपने गाने में धर्म की बंधुआ नहीं हैं. फाग में अगर ईसुरी शृंगार रस पिरो गए हैं तो दिवारी में रहीम और तुलसी सब सुनाई देते हैं.
रात हुई तो दिवानजू तरें जल रही होली से आग लाई गई. दिवानजू यानी दीवान हरदौल. और तरें यानी नीचे. यानी दीवान हरदौल जू के चबूतरे के पास से ये आग लाई गई. हरदौल बुंदेलखंड के सबसे नए, इतिहास में बाकायदा दर्ज और सबसे अधिक पूजनीय देवता हो गए हैं. सुकरात ने अगर अभिव्यक्ति की आजादी के लिए जहर का प्याला पिया था तो हरदौल ने रिश्तों की पवित्रता साबित करने के लिए कोई 350 साल पहले यही काम किया था. बहरहाल आग घर तक आ गई, उस रवायत के तहत जब होली की आग ही साल भर घरों को रौशन करने और चूल्हों को सुलगाने का स्थायी बंदोबस्त होती थी. मां ने गाय के गोबर के बरूलों की माला का इस आग से मिलन कराया और घर में भी होली जल उठी. गुलाल से होली का पूजन हुआ. और रात में ही रंग उडऩे लगे. अगले दिन भी होली चलती रही.
यहां होली से इतनी जल्दी मन नहीं भरता, इसलिए पहले दिन कीचड़ वाली और दोज के दिन रंगों की होली होती है. हालांकि इस बार की हकीकत यह है कि दोनों दिन शहर में सस्ते गुलाल की ही भरमार रही. जब रंगों की उमंग चढ़ी तो तय हुआ कि मातादीन के कुएं पर होली की दावत हो. मातादीन 18-20 साल का सांवला दलित लड़का है. बड़ी विनय से मुस्कुराता है तो पूरा चेहरा दंतकांति से जगमग हो जाता है.
आज इंतजाम उसी के जिम्मे था और साथ देने की जिम्मेदारी राजा ने उठाई. राजा भी इसी उम्र का है. अच्छा गाता है और गायक बनना चाहता है. पसमांदा मुसलमान है और घर की माली हालत खराब है, इसलिए बारहों महीने कोई नया रोजगार कर घर चलाता है, लेकिन पूछो तो सबसे पहले गायक बनने की बात करता है. अनुज सुनीत ने डेढ़ दर्जन लोगों के खाने के लिए आटा माड़ा तो मुझे वाकई समझ में आया कि विद्यार्थी को गृहत्यागी क्यों होना चाहिए. आखिर घर से निकला तभी तो आटे दाल का भाव जान सका.
दो घंटे की मशक्कत के बाद मोटे-मोटे गक्कड़, बैगन का भरता, बूंदी का रायता, जीभ को लपलपाती चटनी और बाद में इमरती की मिठाई सामने आई. कुएं के पास कारसदेव का चबूतरा है. लंबे समय से वहीं बैठकर भोजन का इंतजार हो रहा था. कारसदेव ग्रामजनों खासकर पशुपालकों के देवता हैं. इस चबूतरे पर जब रात में ढाक बजती होगी तो दूर-दूर तक जाती उसकी प्यारी धमक प्रकृति में इंसान के पहले हस्तक्षेपों की याद दिलाती होगी. ढाक की आवाज जितनी दूर से आती है, उतनी ही गहरी लगती है. ढाक वादन की शैली शायद अवनद वाद्यों में सबसे आसान है, लेकिन इसकी सादगी सम्मोहक है.
भोजन शुरू हो गया. ढाई गक्कड़ से आगे शायद ही कोई गया हो. पेट में अन्न जाते ही ढाई घंटे का इंतजार और सुस्ती दूर होने लगी. पानी पीते-पीते और हाथ धोते-धोते कब फिर से गुलाल बोरी से बाहर आ गया और एक दूसरे पर बरसने लगा पता ही नहीं चला. मातादीन के खेत में मटर के पूरे रखे हैं. चना जरूर थोड़ा पिछड़ गया है, लेकिन उम्मीद से है. किसान परास्त है, लेकिन हताश नहीं है. सबने होली खेली इस उम्मीद में कि रंग जिंदगी में रहने चाहिए, फाग जिंदा रहनी चाहिए. फागुनी हवा ऐसे ही बहती रहेगी तो इस बार न सही अगली बार अच्छी फसल होगी. इसी उम्मीद का नाम तो जीवन है.