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मुंबई हमलाः गुमनामी में जीने को मजबूर शहीदों का परिवार

मुंबई पर 26 नवम्बर 2008 को हुए आतंकवादी हमले में जिन जवानों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकवादियों का डटकर मुकाबला किया, उनके परिवार आज गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं.

मुंबई पर आतंकी हमले की फाइल फोटो मुंबई पर आतंकी हमले की फाइल फोटो

मुंबई पर 26 नवम्बर 2008 को हुए आतंकवादी हमले में जिन जवानों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकवादियों का डटकर मुकाबला किया, उनके परिवार आज गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं.

मुंबई पुलिस के हेड कांस्टेबल भानु नारकर की पत्नी सुनंदा नारकर को सीने में एक गोली लगी थी. हमले के पांच साल बाद अब सुनंदा जब भी उन पलों को याद करती हैं तो सहम जाती हैं. सुनंदा के दो बच्चे हैं, जो अभी पढ़ रहे हैं. उनके मुताबिक, जिस दिन हमला हुआ उनके पति कामा हॉस्पिटल के पास ड्यूटी पर थे और कहा था कि शाम को जल्दी आ जाएंगे, लेकिन सुबह उनको पति के मौत का खबर मिली. सुनंदा ने बताया कि पति के न होने से उन्‍हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

सुनंदा ससरकार से काफी नाराज हैं. उनके मुताबिक सरकार ने मदद की बात कही थी, लेकिन उसको पूरा नहीं किया. सरकार ने पति की जगह नौकरी और पूरी पगार देने की बात कही थी पर सिर्फ 5000 की पेंशन अभी तक मिल रही है और सरकार की तरफ से अब कोई आता ही नहीं. सुनंदा ने कहा, 'सरकार ने जो 25 लाख रुपये दिये थे वो भी फिक्स कर दिया, जो कि 10 सालों के बाद मिलेगा. सरकार ने जो घर दिया है, उसका चार्ज बहुत ही ज्यादा है. 5000 हजार के पेंशन से पूरा महीना नहीं चल पाता. सरकार ने कहा था कि पेट्रोल पंप दिया जाएगा, लेकिन उसका भी कुछ पता नहीं है.'

भानु नारकर के साथ कामा हॉस्पिटल पर ड्यूटी कर रहे कांस्टेबल बबन उघडे के परिवार का तो और भी बुरा हाल है. बबन को पेट में 2 गोलियां लगी थीं. बबन के परिवार में उनके तीन बेटे, पत्नी और बड़े बेटे के तीन बच्चे हैं. छोटे बेटे विकास ने कहा, 'रात 12 बजे जब अटैक का पता चला तो हम डर गए और पापा का फोन आया कि घर से बाहर मत निकलना और जब कामा हॉस्पिटल पर हमला हुआ तो मैं डर गया. पापा की मौत की खबर हमको सुबह मिली. ये दिन जब भी आता है हमें पापा की बहुत याद आती है. पापा के जाने के बाद हम लोग बहुत ही मुसीबत के दौर से गुजर रहे हैं.' बबन का परिवार भी सरकार के रवैये से काफी गुस्से में है. उनके मुताबिक परिवार का खर्च चलाना बहुत ही मुश्किल है. सरकार कोई ध्‍यान नहीं देती है. सरकार ने नौकरी देने की भी बात कही थी, लेकिन अभी तक नौकरी नहीं मिली है.

कुछ ऐसा ही हाल जीटी अस्‍पताल के पास ड्यूटी पर रहे सुरक्षाकर्मी शिंदे के परिवार का है. शिंदे को इस हमले में 2 गोलियां लगी थीं. शिंदे के परिवार में पत्नी और उनके दो बच्चे हैं, जो अभी पढ़ रहे हैं. शिंदे की पत्नी आज भी उस हादसे के झटके से बाहर नहीं निकल पाई हैं. शिंदे की बेटी नेहा शिंदे ने कहा, 'जब अटैक हुआ था पापा रात की ड्यूटी पर थे. उस समय हम लोग ट्रेन में थे और ट्रेन रुक गई. बाद में पता चला की पापा को गोली लग गई और सुबह हमें उनके मौत की खबर मिली.'

पत्‍नी सुनंदा शिंदे ने कहा, 'पति की मौत के बाद परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है. उनके जाने के बाद सरकार ने शुरुआत में मदद तो किया, लेकिन अभी कोई पूछने नहीं आता. सरकार ने घर तो दिया, लेकिन यह नहीं बताया था कि इसका किराया भी देना है. अचानक तीन साल बाद जब बिल आया तो ढाई लाख रुपये चुकाने पड़े. पेंशन के पैसे इन बिल को भरकर ही निकल जाता है. इन परिवारों की तरह ही बहुत से ऐसे और भी परिवार है जिन्होंने हमले में अपनों को खोया और आज वो गुमनामी और मुसीबत की जिंदगी जी रहे हैं.

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