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राहुल की कथित 'जासूसी' पर कांग्रेस का हल्ला बोल, आखिर किस लिए?

राहुल गांधी की 'राजनीतिक जासूसी' के मामले में कांग्रेस का हल्ला बोल बेअसर लगने लगा है. सिवा कोरी बयानबाजी के कांग्रेस नेता कोई ठोस तर्क नहीं पेश कर पा रहे हैं.

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राहुल गांधी राहुल गांधी

राहुल गांधी की 'राजनीतिक जासूसी' के मामले में कांग्रेस का हल्ला बोल बेअसर लगने लगा है. सिवा कोरी बयानबाजी के कांग्रेस नेता कोई ठोस तर्क नहीं पेश कर पा रहे हैं.

ये कैसा सवाल?
क्या सरकार राहुल गांधी को उनके नंबर का जूता बनवाकर देने वाली है? ये सवाल लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पूछा था. इस व्यंग्यात्मक सवाल के साथ उन्होंने कहा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष को एसपीजी सुरक्षा मिली हुई है जिससे छन छन कर सारी खबरें सरकार तक पहुंचती होंगी. फिर इसके लिए फॉर्म भरवाने की क्या जरूरत थी? इस पर सरकार दलील है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी पहचान उनके जूते की साइज से की गई थी.

सरकार का जवाब
सरकार की ओर से जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘‘यह सुरक्षा का मुद्दा है जिसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहिए." संसद में सरकार की ओर से दिए जवाब में कहा गया कि हाल-फिलहाल नहीं बल्कि 1957 से देश के प्रमुख व्यक्तियों की सुरक्षा प्रोफाइलिंग की व्यवस्था चली आ रही है. इसे 1987 और फिर 1999 में संशोधित भी किया जा चुका है. इस क्रम में राष्ट्रपति बनने से पूर्व प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पूर्व प्रधानमंत्रियों, बीजेपी अध्यक्ष, कांग्रेस अध्यक्ष समेत 526 वीवीआईपी हस्तियों के समय समय पर ऐसे प्रोफाइल बनाए गए हैं.

फॉर्म की प्रासंगिकता
मामला सुरक्षा का है और इस पर राजनीति बिलकुल नहीं होनी चाहिए, इस पर कोई सवाल नहीं उठ रहा. लेकिन अब ऐसे फॉर्म की प्रासंगिकता कितनी रह गई है? दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी का कहना है, "अगर किसी वीवीआईपी के घर के बाहर प्रदर्शन हो गया तो ऐसी जानकारी के बिना उसके स्टाफ को पहचानना मुश्किल हो जाएगा." लेकिन मीडिया रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलता है कि खुद कुछ पुलिस अफसर ही इसे अब महज एक कागजी खानापूर्ति मान रहे हैं. वैसे ये व्यवस्था तब बनाई गई थी जब वीवीआईपी के बारे में हर किसी को इतनी जानकारी नहीं होती थी. मौजूदा दौर में टीवी और अखबार से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसी जानकारियों से पटे पड़े हैं. फिर भी नियम तो नियम है, उसका पालन तो होना ही चाहिए.

25 साल बाद
बात 1991 की है. तब केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे और कांग्रेस एक मौके की तलाश में थी. उस वक्त कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार ने महज इसलिए समर्थन वापस ले लिया था क्योंकि राजीव गांधी के घर के बाहर दो पुलिस वाले घूमते देखे गए थे. कांग्रेस पार्टी का दावा था कि वे राजीव गांधी की जासूसी कर रहे थे. वैसे फिलहाल कांग्रेस के पास ऐसा कोई राजनीतिक मौका नहीं है. केंद्र में भारी बहुमत वाली सरकार है.

तो क्या कांग्रेस की ये सारी कवायद संसद में जैसे तैसे मोदी सरकार को घेरने की है? या फिर छुट्टी पर चल रहे राहुल गांधी के प्रति श्रद्धाभक्ति जताने की रुटीन एक्टिविटी है?

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