जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी का कहना है कि लड़कियों को शिक्षित करना अच्छी बात है, लेकिन उनकी शिक्षा अलग से हो. उन्होंने जोर दे कर कहा कि सह शिक्षा से ही समस्याओं की शुरुआत होती है. मौलाना ने भी दुष्कर्म दोषियों को मौत की सजा देने की हिमायत की है.
मौलाना जलालुद्दीन उमर ने कहा कि सिर्फ कानून बना देने से दुष्कर्म की घटनाएं नहीं रुक सकती. सरकार की जिम्मेदारी समाज को जागरूक बनाना भी है.
मौलाना ने कहा कि आज समाज में चारों तरफ अश्लीलता है. वास्तविक परेशानी सह शिक्षा से शुरू होती है. हमारा कहना है कि लड़कियों को खूब पढ़ाओ, लेकिन उनकी शिक्षा लड़कों से अलग होनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि इस्लाम में यौन अपराधों के लिए कोई जगह नहीं है. आज हमारा समाज लिव-इन रिलेशनशिप को भी न सिर्फ बर्दाश्त कर रहा है, बल्कि सहजता से स्वीकार कर चुका है. इससे समस्याएं खड़ी होती हैं. लिव-इन में रहने वाला व्यक्ति विवाह की परवाह ही नहीं करता.
इस्लाम परिवर्तन आंदोलन के उद्देश्य से 1941 में जमात-ए-इस्लामी की स्थापना हुई. देश विभाजन के बाद यह जमात-ए-इस्लामी हिंद हो गया और लोगों के बीच इस्लाम का संदेश पहुंचाने का कार्य कर रहा है. जमात के इस कार्य में आठ हजार सदस्य तथा लाखों कार्यकर्ताओं के कारण केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में मुस्लिम समाज में जमात की अच्छी पैठ है.
उमरी ने कहा कि सरकार सिर्फ उन लोगों के विवाह को वैध करार दे जिनका विवाह धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ हो.
उन्होंने कहा कि मुस्लिम, हिंदू तथा इसाई अपने रिवाज के अनुसार ही विवाह करें. केवल धार्मिक रिवाज के अनुसार हुई शादियों को ही वैधता दी जाए. लंबे समय तक साथ रहने के बाद कोर्ट से रजिस्टर करा लेने मात्र से कोई रिश्ता वैध नहीं ठहराया जा सकता. इस तरह के रिश्ते समाज के हित के लिए ठीक नहीं हैं.
औरतों की सुरक्षा के मद्देनजर बनी जे.एस. वर्मा समिति के समक्ष जमात द्वारा प्रस्तुत 11 सुझावों में दुष्कर्मियों को फांसी की सजा तथा सह शिक्षा एवं लिव इन संबंधों पर प्रतिबंध प्रमुख हैं. दुष्कर्म के लिए आर्थिक सजा को भी वे ठीक मानते हैं क्योंकि इससे ऐसे अपराधों पर रोक लग सकती है.
उमरी ने कहा कि इस तरह का अपराध करने वालों को समाज के बीच सजा दी जानी चाहिए ताकि समाज में इस बात का भय हो कि इस तरह का अपराध करने पर क्या हो सकता है.