scorecardresearch
 

अफगान सिख और हिंदू परिवारों के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक बना उम्मीद

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को कैबिनेट की मंजूरी के बाद भले ही विपक्षी दलों की आलोचना झेलनी पड़ रही है, पर राष्ट्रीय राजधानी में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो इस विधेयक की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 का हो रहा है विरोध (फोटो-PTI) नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 का हो रहा है विरोध (फोटो-PTI)

  • नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को कैबिनेट की मंजूरी
  • दिल्ली में रहने वाले बहुत से लोग इसे उम्मीद से देख रहे हैं

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को कैबिनेट की मंजूरी के बाद भले ही विपक्षी दलों की आलोचना झेलनी पड़ रही है, पर राष्ट्रीय राजधानी में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो इस विधेयक की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं.

कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब अगले हफ्ते यह विधेयक संसद में पेश किया जा सकता है. कैबिनेट ने इसे 4 नवंबर को मंजूरी दे दी, हालांकि, विपक्षी पार्टियों ने इस बिल का तीखा विरोध किया है. विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है.

इसके उलट, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस विधेयक का स्वागत कर रहे हैं और इसके आने को लेकर उन्हें काफी उम्मीद बंधी है. इनमें वे हिंदू परिवार भी हैं जो 80 और 90 के दशक में अफगानिस्तान से भारत इस उम्मीद में आए थे कि यहां उन्हें जीवन की बेहतर संभावना और धार्मिक सुरक्षा मिलेगी. उनका कहना है कि यह बिल जल्द से जल्द पारित किया जाना चाहिए.

1980 से लेकर 1993 के बीच बहुत से सिख और हिंदू परिवार शरणार्थी के रूप में अफगानिस्तान से भारत आए थे. वहां उन्हें धार्मिक असुरक्षा के अलावा तालिबान, स्थानीय मुजाहिद्दीन से खतरा था. ये परिवार अफगानिस्तान के विभिन्न प्रांतों से आए थे.

इंडिया टुडे ने दिल्ली में ऐसे कई हिंदू और सिख परिवारों से मुलाकात की. ये अल्पसंख्यक परिवार अफगानिस्तान के काबुल, जलालाबाद, गजिनी, गांधार, लोगर, कुंडज, परवान और हेलमंड जैसे इलाकों में रहते थे.

इन्हें दिखती है उम्मीद

81 वर्षीय रामनाथ कपूर और उनकी पत्नी राममूर्ति कपूर उन लोगों में से हैं जो 1993 में काबुल से दिल्ली आए. फिलहाल वे दिल्ली के सीआर पार्क में रहते हैं और पिछले कुछ वर्षों से अफगानी पासपोर्ट के साथ, बिना वैध वीजा के रह रहे हैं. रामनाथ कपूर ने इंडिया टुडे से कहा, "1989 में मुजाहिद्दीन और ता​लिबान ने अल्पसंख्यकों पर हमला करना शुरू कर दिया. हमारे पास वहां से भागने के अलावा और कोई चारा नहीं था और हमने वही किया."

रामनाथ कपूर ने बताया, "वह डरावना समय था जब हमारे घरों के चारों ओर रॉकेट हमला हुआ था. हम 1993 में अफगानिस्तान पासपोर्ट पर तीन महीने के वैध वीजा के साथ भारत आए थे, लेकिन हमारा वीजा समाप्त हो गया है और इसे पिछले 2 वर्षों से बढ़ाया नहीं गया है."

रामनाथ कपूर ने इंडिया टुडे को बताया कि अब वे भारत में बिना वैध वीजा के ही रह रहे हैं. उनकी पत्नी राममूर्ति भी उस खुशहाल वक्त को याद करती हैं कि कैसे वे अपने परिवार के साथ अफगानिस्तान में रह रही थीं, लेकिन उसी बीच तालिबान ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

उन्होंने कहा, "हम पर नकाब पहनने का दबाव डाला जाता था, महिलाओं को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती थी."

रमन कपूर कहते हैं कि उनके लिए भारत में रहने के लिए नागरिकता की लड़ाई कुछ लंबी हो गई है, लेकिन आखिरकार नागरिकता संशोधन विधेयक के आने से हमारे जैसे तमाम लोगों के लिए उम्मीद की किरण जागी है.

इसी तरह अफगान हिंदू सुरेश खन्ना भी 1991 में अफगानिस्तान से भारत आए थे. सुरेश ने हमें बताया, "काबुल में मेरा ड्राई फ्रूट्स का कारोबार था, लेकिन हिंदुओं और सिखों के खिलाफ मुजाहिदीन और तालिबान का हमला इतना क्रूर था कि हमारे पास अफगानिस्तान छोड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था."

सुरेश कहते हैं, "अगर हमें भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी जाए तो हम सभी वास्तव में खुश होंगे और हमारे पास एक ऐसा देश होगा जिसमें हम बिना डरे रह सकेंगे."

सिर्फ अफगानी हिंदू ही नहीं, बल्कि 1980 और 1990 के दशक में हजारों की तादाद में सिख समुदाय के लोगों को भी अफगानिस्तान छोड़ने को मजबूर किया गया. बड़ी संख्या में सिख समुदाय के लोग भारत आए और फरीदाबाद, ग्रेटर कैलाश, तिलक नगर जैसे इलाकों में बस गए. ग्रेटर कैलाश की एक गुरुद्वारा का नाम ही अफगानी गुरुद्वारा है क्योंकि यहां रहने वाले ज्यादातर सिख अफगान से विस्थापित होकर यहां आए हैं. इंडिया टुडे ने इस गुरुद्वारे का भी दौरा किया.

दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके इन सिखों और हिंदुओं के लिए आवाज उठाते रहे हैं और इनके मसले को विभिन्न सरकारों के समक्ष उठाते रहे हैं.

मंजीत सिंह जीके ने इंडिया टुडे से कहा, "90% अफगानी सिख अफगानिस्तान के प्रेसीडेंट नजीबुल्लाह के खिलाफ तख्तापलट के बाद  विस्थापित हुए. अफगानिस्तान सेकुलर देश था, लेकिन इस पर जल्दी ही कट्टरपंथियों का कब्जा हो गया और उन्होंने सबसे पहले अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया. उनकी धार्मिक आजादी छीनी गई, धार्मिक स्थल तोड़े गए, यहां तक कि हिंदुओं और सिखों को वहां से अपना सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा."

उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को संसद द्वारा पास किए जाने के ​बाद, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले तमाम हिंदू और सिख समुदाय के लोग खुशी से भारत आएंगे और यहां बसेंगे."

अफगानिस्तान से भारत आए

हरिंदर सिंह भी उन लोगों में से हैं जो 1989 में अफगानिस्तान से भारत आए थे. उन्होंने बताया, "जिंदगी हमारे लिए दयनीय थी, हमारे पास कोई धार्मिक स्वतंत्रता नहीं थी. अफगानिस्तान में कट्टरपंथी हमसे कहते थे कि तुम लोग भारत जाओ, अफगानिस्तान तुम्हारा देश नहीं है. जब हमारे परिवारों पर हमले होने लगे तो उसके बाद हम सबने उस देश को छोड़ने और भारत में पलायन करने का फैसला किया."

हिंदू सिख वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष तजिंदर सिंह खुराना के परिवार ने भी 1980 में अफगानिस्तान छोड़ा था और वे लोग भारत आए थे. वे हिंदू और सिख आप्रवासियों के लिए नागरिकता के अधिकार की लड़ाई लड़ते रहे हैं. उन्होंने कहा, "जिन्होंने अफगानिस्तान छोड़ा उनके लिए जिंदगी वाकई बहुत कठिन हो गई थी. बहुत से लोग बिना कानूनी दस्तावेज, बिना वीजा, बिना पासपोर्ट के आए थे. हम एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा सकते थे, हमारे लिए कोई रोजगार नहीं था. बहुत से हिंदुओं और सिखों को अफगानिस्तान से जर्मनी, लंदन और फ्रांस भेज दिया गया था और कुछ भारत आ गए थे."

अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ आतंक के दौर को याद करते हुए वे कहते हैं कि हम तमाम हमलों से बचते हुए यहां आए थे. वे कहते हैं कि नागरिकता संशोधन बिल हमारे लिए एक उम्मीद है. हमें एक देश की नागरिकता मिल जाएगी. हमारा जीवन आसान हो जाएगा और हम धार्मिक आजादी के साथ आराम की जिंदगी जी सकेंगे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें