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विपक्ष में बिखराव, कुमारस्वामी की नरमी, येदियुरप्पा की जीत के ये हैं बड़े कारण

प्रदेश की 15 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एकतरफा जीत हासिल की है. जिन सीटों पर चुनाव हुए हैं, ये सीटें कांग्रेस और जेडीएस की मजबूत गढ़ मानी जाती हैं. इन सीटों पर बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रही है.

बीजेपी को 12 सीटों पर प्रचंड जीत मिली है (फोटो-ANI) बीजेपी को 12 सीटों पर प्रचंड जीत मिली है (फोटो-ANI)

  • भाजपा को 12, कांग्रेस को 2 सीटें और जेडीएस खाली हाथ
  • BJP को 50.3 प्रतिशत, कांग्रेस को 31.3 प्रतिशत वोट मिले

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा का जादू एक बार फिर लोगों के सिर चढ़कर बोला है. प्रदेश की 15 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एकतरफा जीत हासिल की है. जिन सीटों पर चुनाव हुए हैं, ये सीटें कांग्रेस और जेडीएस की मजबूत गढ़ मानी जाती हैं. इन सीटों पर बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रही है. इसके पीछे बीजेपी का बागियों पर दांव खेलना और विपक्ष के बिखराव सहित कई कारण रहे, जिसके चलते बीएस येदियुरप्पा ने प्रचंड जीत हासिल की है.

बागियों पर दांव

कर्नाटक में बागियों पर दांव लगाना बीजेपी के लिए लाभ का सौदा साबित हुआ है. 224 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस और जेडीएस के कुल 17 विधायकों के इस्तीफा देने से बीती जुलाई में कुमारस्वामी की गठबंधन सरकार गिर गई थी. इस्तीफा देने वाले सभी विधायकों को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्य करार देकर उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी. मगर, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में इन अयोग्य करार दिए गए विधायकों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी. जिसके बाद बीजेपी ने चुनाव वाली 15 सीटों पर उन्हीं अयोग्य विधायकों को टिकट दिया. इन विधायकों ने जीत दर्ज की और येदियुरप्पा सरकार को बहुमत से आगे पहुंचा दिया.

विपक्ष एकजुट नहीं रहा

चुनाव के नतीजे से साफ है कि कर्नाटक में विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एकजुट नहीं रहा. जेडीएस ने 15 में से 12 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. इन 12 सीटों पर त्रिकोणीय लड़ाई में कांग्रेस और जेडीएस के बीच धर्मनिरपेक्ष वोटों का बंटवारा हुआ और उसका बीजेपी को लाभ मिला. जैसा कि मई 2018 के विधानसभा चुनाव में और अतीत के अन्य चुनावों में हुआ हो चुका है, विपक्ष ने अपनी पिछली भूलों पर गौर नहीं किया और एकजुट होकर नहीं लड़ा. लिहाजा बीजेपी बाजी मार गई.

सक्रिय नहीं दिखे कुमारस्वामी

उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी उतने सक्रिय नहीं दिखे जितना उन्हें विधानसभा चुनाव में देखा गया. यही कारण रहा कि जेडीएस का प्रचार अभियान भी पिछड़ गया और 5 दिसंबर को 12 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली जेडीएस एक भी सीट नहीं जीत पाई. गठबंधन के अपने पूर्व साथी कांग्रेस से अलग होकर जेडीएस ने खुद के दम पर एक दर्जन सीट पर सत्तारूढ़ बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था. मई 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में 36 सीटें जीतने वाली जेडीएस कांग्रेस से गठबंधन कर 12 साल बाद सत्ता पर काबिज हुई थी और कुमारस्वामी दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन इस बार उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा है.

बैकफुट पर रही कांग्रेस

उपचुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 12 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस को दो सीटें मिली हैं. कांग्रेस को मैसुरू जिले के हुनसुरू और बेंगलुरू मध्य के शिवाजीनगर में जीत मिली है. कर्नाटक कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार और दिनेश गुंडू राव राजनीति में काफी सक्रिय दिखे लेकिन उनकी रणनीति कारगर साबित नहीं हुई. डीके शिवकुमार का आयकर मामले में जेल जाना उनकी पार्टी को घाटे में डाल गया. इसके अलावा सिद्धारमैया, जी परमेश्वर, डीके शिवकुमार, दिनेश गुंडू राव समेत कुछ नेताओं पर बेंगलुरु पुलिस की ओर से दर्ज मानहानि और देशद्रोह का केस मतदाताओं के बीच नकारात्मक असर छोड़ गया. कहीं न कहीं कांग्रेस को इसका खामियाजा जरूर भुगतना पड़ा है.

उपचुनाव में सत्तापक्ष

15 में 12 सीटों पर जीत से सत्तापक्ष (बीजेपी) बुलंद है. सत्तारूढ़ पार्टी ने अठानी, कगवाड़, गोकक, येल्लापुर, हिरेकुरू, विजयनगर, रानीबेन्नूर, चिकबल्लापुर, के.आर. पुरा, महालक्ष्मी लेआउट, यशवंतपुर और कृष्णराजपेट सीटों पर जीत दर्ज की है. सत्तारूढ़ बीजेपी को 222 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए आवश्यक 112 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए केवल सात सीटों की जरूरत थी लेकिन उसने 12 सीटों पर जीत दर्ज की और इसके साथ ही अब चार माह पुरानी बीजेपी सरकार मई 2023 तक अपना कार्यकाल पूरा कर सकेगी. इस उपचुनाव में बीजेपी को 50.3 प्रतिशत, कांग्रेस को 31.3 प्रतिशत और जेडीएस को 12.1 प्रतिशत मत मिले.

बीजेपी अपने कैंपेन में सफल

बीजेपी ने उपचुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. बी.एस. येदियुरप्पा मंत्रियों और संगठन पदाधिकारियों के साथ विधानसभा क्षेत्रों में दिन-रात कैंप करते दिखे. बीजेपी महासचिव पी. मुरलीधर राव बतौर कर्नाटक प्रभारी उपचुनाव की मॉनिटरिंग में व्यस्त रहे. कई दफा वे राज्य में बीजेपी कोर कमेटी की बैठक लेकर पार्टी नेताओं को चुनाव प्रबंधन का पाठ पढ़ाते देखे गए. इस प्रकार की कैंपेनिंग करने में विपक्ष चूक गया और उसे हार का मुंह देखना पड़ा.

स्थिर सरकार था मुद्दा

कुमारस्वामी सरकार गिरने के बाद लोगों के सामने स्थिर सरकार बड़ा मुद्दा था. वोट प्रतिशत और शेयर (50.3 फीसदी) से साफ है कि लोगों ने स्थिरता को देखते हुए बीजेपी पर भरोसा जताया. जनता बीजेपी को वोट देकर बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में स्थिर सरकार देखना चाहती थी क्योंकि लोग कांग्रेस-जेडीएस की सरकार का हश्र देख चुके हैं. यह भी कहा गया कि कांग्रेस कर्नाटक को मध्यावधि चुनाव में झोंकना चाहती है, जिसके खिलाफ बीजेपी ने जमकर प्रचार किया. इसका उसे फायदा मिला और 15 में 12 सीटें जीतने में सफल रही.

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