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खट्टा सिंह की गिरफ्तारी से अंशुल छ्त्रपति को फिर जगी इंसाफ की आस

अंशुल ने भरोसा व्यक्त किया है कि खट्टा सिंह का बयान मामले में अहम साबित हो सकता है. अंशुल की मानें तो खट्टा सिंह को उनके पिता की हत्या के बारे में अहम जानकारी है.

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राम रहीम के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार अंशुल छत्रपति
राम रहीम के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार अंशुल छत्रपति

दुष्कर्मी गुरप्रीत राम रहीम के ड्राइवर खट्टा सिंह की गिरफ्तारी के साथ सिरसा के जुझारू पत्रकार अंशुल छत्रपति को फिर से न्याय की उम्मीद बंध गई है. राम रहीम पर अंशुल के पत्रकार पिता रामचंद्र छत्रपति की हत्या का आरोप है, जिस पर शनिवार को पंचकुला सीबीआई अदालत में सुनवाई चल रही है.

ज्ञात हो कि रामचंद्र छत्रपति ने ही अपने स्थानीय अखबार 'पूरा सच' में पहली बार राम रहीम का भंडाफोड़ किया था और दुष्कर्म की शिकार डेरा में रह चुकी साध्वी की चिट्ठी प्रकाशित की थी.

अंशुल ने भरोसा व्यक्त किया है कि खट्टा सिंह का बयान मामले में अहम साबित हो सकता है. अंशुल की मानें तो खट्टा सिंह को उनके पिता की हत्या के बारे में अहम जानकारी है.

सीबीआई ने खट्टा सिंह को मुख्य गवाह भी बनाया था, लेकिन सुनवाई के दौरान ही वह अपने बयान से मुकर गया।

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अंशुल कहते हैं, "पहले भी सीबीआई ने खट्टा सिंह को मुख्य गवाह बनाया था. लेकिन ऐसा लगता है कि खट्टा सिंह किसी दबाव में आ गया और एकाएक अपने बयान से पीछे हट गया."

ऐसे में अब देखना होगा कि कोर्ट खट्टा सिंह के बयान को कितना विश्वसनीय मानती है.

राम रहीम के अनुयायी दरअसल कुलदीप सिंह और निर्मल सिंह पर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति पर गोलियां चलाने का आरोप है. सीबीआई ने खट्टा सिंह के बयानों के आधार पर यह साबित करना चाहती है कि कुलदीप और निर्मल साधारण अनुयायी नहीं थे, बल्कि उन्हें हथियार चलाने की बाकायदा ट्रेनिंग दी गई थी.

अंशुल का मानना है की राम रहीम को दुष्कर्म का दोषी करार देते हुए सजा सुनाए जाने से लोगों में एकबार फिर इंसाफ के प्रति भरोसा बढ़ा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अपने पिता के हत्यारे को सजा दिलाने के लिए वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे.

अंशुल ने कहा, "हमने इतने साल इंसाफ की लड़ाई लड़ी और अब लगने लगा है कि यह लड़ाई व्यर्थ नहीं जाएगी. जिस तरह कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया, उससे एकबार फिर यकीन हुआ है कि इंसाफ मिलकर रहेगा.

पिता के हत्या के बाद अंशुल ने अखबार 'पूरा सच' की जिम्मेदारी संभाली. अंशुल के लिए पिता की विरासत को ढूंढना आसान नहीं था. तमाम दबाव और धमकियों के बावजूद अंशुल 2014 तक इस अखबार को निकालते रहे.

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