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गरीबों को महंगाई की मार से बचा रहें हैं दिल्‍ली के मल्‍होत्रा

कहते हैं, मुश्किलें आने के बाद ही नई राह निकलती है. ऐसा ही जी.आर. मल्होत्रा (78) के साथ भी हुआ. जब उन्होंने लोगों को महंगाई से त्रस्त देखा तो ऐसे कार्य का श्रीगणेश किया, जो अपने आप में अनूठा था- सस्ते में राशन.

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कहते हैं, मुश्किलें आने के बाद ही नई राह निकलती है. ऐसा ही जी.आर. मल्होत्रा (78) के साथ भी हुआ. जब उन्होंने लोगों को महंगाई से त्रस्त देखा तो ऐसे कार्य का श्रीगणेश किया, जो अपने आप में अनूठा था- सस्ते में राशन.

केंद्रीय लोक निर्माण विभाग से एक्जिक्यूटिव इंजीनियर पद से सेवानिवृत्त मल्होत्रा बताते हैं, ''मैंने बाबा लाल सिंह की प्रेरणा से 1971 में सस्ती दरों पर राशन देने का फैसला लिया था. उस समय भारत-पाकिस्तान युद्ध के चलते महंगाई आसमान छू रही थी. हमारा यह प्रयास आम लोगों के लिए था.''

शुरू में 10-10 किग्रा दाल-चावल से शुरू हुआ, सस्ते राशन का काम आज टनों में पहुंच गया है. दिल्ली के यमुना पार के जगतपुरी इलाके में हर शनिवार सुबह साढ़े पांच बजे मल्होत्रा राशन वितरण का काम शुरू करते हैं और यह रात के आठ बजे तक चलता है. वे सरकार से कोई मदद नहीं लेते हैं.

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बुधवार को नया बाजार से दालें, चावल और अन्य घरेलू सामान खरीदा जाता है. बृहस्पतिवार को एक-एक किलो के पैकेट बनाए जाते हैं, और शनिवार को वितरण कर दिया जाता है. दिलचस्प यह कि उनके साथ 45 लोग जुड़े हुए हैं, जो बारी-बारी से मदद करते हैं. वह भी बिना किसी स्वार्थ के.

आखिर सस्ते में राशन बेचने के बाद वह किस तरह इस स्टोर को चला पाते हैं, पर मल्होत्रा बताते हैं, ''हमारे यहां दान की परंपरा है. लोग आते हैं और सामर्थ्य के अनुसार दान करते हैं और हम उससे राशन खरीदकर लोगों को दान में देते हैं. कई दानदाता ऐसे भी आते हैं जो अपने पैसे से दो रु. किग्रा आटा या 10 रु. किग्रा की दर से चावल दे जाते हैं.'' {mospagebreak}

यही नहीं, वे स्टोर में आने वाले हर शख्स से दान के लिए कहते हैं, फिर बेशक वह 11 रु. का हो या 1,100 रु. का, यह मायने नहीं रखता. इसके पीछे उनका यह मानना है कि पर्ची कटवाने से सस्ती दर पर राशन लेने से लोगों के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचती और दान का भाव रहता है. खास यह कि लोगों द्वारा कटाई जाने वाली चंदे की पर्ची से आने वाले पैसों को सब्सिडी में जोड़ दिया जाता है.

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मल्होत्रा बताते हैं, बाजार में चीनी 36 रु. किग्रा है लेकिन यहां 20 रु. किग्रा पर इसे बेचा जा रहा है जबकि अरहर की दाल 80-90 रु. प्रति किग्रा है लेकिन यहां 60 रु. मिलती है. राशन लेने की एक सीमा है. चीनी एक किलो से ज्‍यादा नहीं मिलती है.

इस सेवा कार्य में मल्होत्रा के साथ जुड़े एस.के. मदान की उम्र 80 साल है और वे पूरी सक्रियता के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं. इसी तरह एमटीएनएल में कार्यरत अनिल कुमार अरोड़ा (58) स्टोर पर पूरी तत्परता से काम करते नजर आते हैं. अरोड़ा बताते हैं, ''यहां कोई भी आकर राशन ले सकता है. मल्होत्रा जी इस काम को 39 साल से अंजाम दे रहे हैं और अब तो उन्हें लोग राशन वाले बाबा के नाम से भी पहचानने लगे हैं.''

बेशक शनिवार को पूरे दिन सेवा करने वाले लोग बदलते रहते हैं लेकिन मल्होत्रा रात तक वहीं रहते हैं और मुंहजबानी हिसाब करते जाते हैं. इस काम में उनकी धर्मपत्नी भी बखूबी मदद करती हैं. मल्होत्रा कहते हैं, ''मुझे अफसोस है कि देश की सेवा के लिए मुझे एक ही जीवन मिला है.''

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