बीते 30 साल से कमलाथाल सूरज उगने से पहले उठती हैं. वो इडली बनाने के लिए लेई (बैटर) निकालती हैं जो उन्होंने पिछली रात को मिक्स की थी. साथ ही वो सांभर बनाने के लिए सब्जियां काटती हैं और नारियल की चटनी बनाती हैं. छह बजे तक वो अपना घर उन लोगों के लिए खोल देती हैं जो गर्मागर्म और मुलायम इडली खाने का इंतजार कर रहे होते हैं.
पेरूर के निकट वादिवेलाम्पलायम गांव की इस इडली की ख्याति आसपास भी फैली है. आप कहेंगे इस इडली में ऐसी क्या खासियत है. दरअसल कमलाथाल हर इडली के लिए सिर्फ एक रुपया लेती हैं. जी हां, आपने ठीक पढ़ा एक रुपया.
कमलाथाल की इडली के शौकीन एक शख्स ने बताया, वो बीते 30-35 साल से ऐसा कर रही हैं. अगर आप पास के एक गांव में जाएंगे तो इडली 6 रुपए और डोसा 20 रुपए में मिलता है. यहां कई लोग आकर सस्ते में और ठीक से स्वादिष्ट इडली खा सकते हैं.

कमलाथाल ने बताया, 'पहले इडली के लिए महज 50 पैसे ही लिए जाते थे. लेकिन सामग्री महंगी होने की वजह से कुछ साल पहले इसे बढ़ाकर 1 रुपया कर दिया गया. हर कोई इडली, सांभर और चटनी की तारीफ करता है.'
कई साल से इडली की कीमत एक रुपए ही है. कमलाथाल इडली बनाने के लिए अब पुराने सिलबट्टे (पत्थर) का ही इस्तेमाल करती हैं. वो इलेक्ट्रिक स्टोन ग्राइंडर इस्तेमाल करने से मना करती हैं. उनकी रसोई में स्टोव नहीं पुराने जमाने की भट्टी है. 80 वर्षीय कमलाथाल एक दिन में 1000 से अधिक इडली बेच लेती हैं. जब उनसे इडली की इतनी कम कीमत रखने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मुनाफा उनकी प्राथमिकता नहीं है बल्कि लोगों का पेट भरना उन्हें इस काम के लिए प्रेरित करता है.
सिर्फ गांव ही नहीं आसपास के लोग भी इडली का स्वाद चखने कमलाथाल की कदई (रसोई) में आते हैं. उनका कहना है कि सबसे खास बात है गर्मागर्म इडली को कमलाथाल जिस प्रेम से परोसती हैं, उसकी कहीं मिसाल नहीं मिलेगी.