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सचिन पायलट ने कड़ी मेहनत से कांग्रेस को दिलाई जीत, फिर क्या हुआ कि बन गए बागी

पायलट के कंधों पर बैठकर कांग्रेस ने सत्ता में वापसी तो कर ली थी, लेकिन जब जीत का सेहरा बंधने का नंबर आया तो अशोक गहलोत का अनुभव और पार्टी में उनकी पकड़ युवा सचिन पायलट की पांच साल की मेहनत पर भारी पड़ गई.

राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट

  • राजस्थान में पायलट ने बड़ी मेहनत से दिलाई थी कांग्रेस को जीत
  • जीत का सेहरा बंधने का नंबर आया तो गहलोत आ गए रास्ते में
  • पूछताछ के लिए एसओजी के नोटिस से नाराज हो गए पायलट

सचिन पायलट, युवा चेहरा, आक्रामक शैली, जमीनी मुद्दों की समझ, विदेश से पढ़ाई और पिता से मिली राजनीतिक विरासत. मतलब सचिन पायलट के पास राजनीति की बिसात पर बाजियां मारने का हर हुनर मालूम है. बिसात भी रेतीले राजस्थान जैसी, जहां आंधी आनी आम बात है. उनसे निकलना, रास्ता ढूंढना और फिर आगे बढ़ते रहने की चुनौती, जिस पर सचिन पायलट हर बार खरे उतरते रहे हैं.

राजेश पायलट जैसे दिग्गज के बेटे सचिन पायलट 26 साल की उम्र में कांग्रेस से सांसद बने तो 35 साल की उम्र में उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में जगह दी गई. इसके बाद 2014 में उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अहम जिम्मेदारी सौंप दी गई. इस जिम्मेदारी में उनके जोश और जुनून ने अहम किरदार निभाया.

याद कीजिए साल 2013 का विधानसभा चुनाव. दिसंबर की सर्दी में भी नतीजों की सरगर्मियों में कांग्रेस, बीजेपी की आंधी में उड़े जा रही थी. राज्य के इतिहास में सबसे खराब प्रदर्शन वाली पार्टी की तोहमत गहलोत सरकार पर लग चुकी थी. राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार कुल जमा 21 सीट पर सिमट गई थी. इसके बाद पार्टी की सत्ता में वापसी की जिम्मेदारी सचिन पायलट ने अपने कंधों पर ली.

पांच साल तक जी तोड़ मेहनत की

पांच साल तक सचिन पायलट ने खूब मेहनत की. न दिन देखा, न रात. राजस्थान के कोने-कोने में सभाएं कीं और दो मोर्चों पर एक साथ काम किया. एक तरफ बीजेपी की उस वक्त की वसुंधरा सरकार के खिलाफ माहौल बनाया तो दूसरी तरफ संगठन को मजबूत किया. ये वो वक्त था जब अशोक गहलोत दिल्ली में राहुल गांधी के साथ राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त थे. आखिरकार सचिन पायलट की मेहनत रंग लाई और 2018 में राजस्थान में वसुंधरा सरकार का बोरिया बिस्तर सिमट गया और कांग्रेस की शानदार वापसी हुई. ये वापसी इतनी जबरदस्त थी कि पांच साल पहले 21 सीट जीतने वाली कांग्रेस के खाते में आईं पूरी सौ सीटें.

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सचिन पायलट के कंधों पर बैठकर कांग्रेस ने सत्ता में वापसी तो कर ली थी, लेकिन जब जीत का सेहरा बंधने का नंबर आया तो अशोक गहलोत का अनुभव और पार्टी में उनकी पकड़ युवा सचिन पायलट की पांच साल की मेहनत पर भारी पड़ गई. वो रूठ गए. रूठना लाजमी भी था क्योंकि उन्होंने इस विधानसभा चुनाव में जी तोड़ मेहनत की थी. खैर, किसी तरह आलाकमान ने उन्हें मनाया और आखिरकार उन्हें उपमुख्यमंत्री पद सौंप दिया गया.

कहां हुआ खेल...

राजस्थान में कांग्रेस को जीत मिलने लगी सचिन तो मानो शहंशाह बन गए. राजस्थान में वो अपनी पार्टी को सत्ता की दहलीज तक ले आये, तय सा था कि मुख्यमंत्री वही बनेंगे, खुद राहुल गांधी भी यही चाहते थे, मगर एक सीट कम रह गई थी, और यहीं खेल हो गया. गहलोत अपने साथ 13 निर्दलीयों को ले आए. इसके बावजूद राहुल गांधी पायलट को ही राजस्थान का पायलट बनाने के पक्ष में थे. मगर गहलोत खेमा अड़ गया. दोनों पक्षों में सियासी तलवारें खिंच गईं.

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ये ऊपर की तस्वीर उसी तनातनी के बीच मान मनव्वल की है, सचिन को झुकना पड़ा, डिप्टी सीएम पद से सब्र करना पड़ा. मगर दिल्ली से लौटते ही तल्खी जयपुर में परवान पर चढ़ गई. शपथ ग्रहण समारोह में सचिन ने अपने लिए राज्यपाल के बगल में कुर्सी लगवाई, गहलोत चाहते थे कि कुर्सी सिर्फ उनकी लगे. बताया जाता है कि उन्होंने सचिन को ये कहकर कि उपमुख्यमंत्री कोई वैधानिक पोस्ट नहीं है, नीचा दिखाने की कोशिश की. इसके बाद तो समझौता और सुलह की बातें सिर्फ दस्तावेजों तक रहीं, हकीकत से कोसों दूर.

जब अनबन आने लगी सामने

बहरहाल, सबको लगा कि ये फॉर्मूला साल 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए बनाया गया है. लेकिन कुछ ही महीनों बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट की अनबन सामने आने लगी और सत्ता पर शक्ति प्रदर्शन की खींचतान बढ़ती ही चली गई.

विधानसभा में दाखिल होने के रास्ते पर भी गहलोत-पायलट आमने-सामने आ गए. सचिन पायलट उसी एंट्री से जाना चाहते थे जिनसे सीएम-स्पीकर जाते हैं. तनातनी बढ़ी तो पायलट को स्पेशल गेस्ट वाले गेट से एंट्री दी गई. अशोक गहलोत ने धीरे-धीरे सचिन पायलट के करीबी मंत्रियों को भी अपने खेमे में मिला लिया. प्रियंका गांधी के राजनीति में आने पर अशोक गहलोत दस जनपथ के और करीब होते गए.

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सचिन को बताया गया था कि 2019 तक कांग्रेस को राजस्थान में अशोक गहतोल के अनुभव की सख्त जरूरत है, और ये भी कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी ताजपोशी हो जाएगी. लेकिन जब ताजपोशी दूर-दूर तक होती नहीं दिखी तो सचिन पायलट तख्तापलट करने निकल पड़े. आग में घी डालने का काम एक चिट्ठी ने किया. सरकार गिराने की कोशिश के मामले को लेकर पूछताछ के लिए डिप्टी सीएम को जांच दल के सामने पेश होना था, पानी सचिन पायलट के सिर से ऊपर निकल गया, उन्हें अफसोस होगा कि वो इस पानी के ऊपर पराक्रम नहीं दिखा सके.

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