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भारत

मदर टेरेसा के चमत्कार और संत बनाने पर उठते रहे हैं सवाल

मदर टेरेसा के चमत्कार और संत बनाने पर उठते रहे हैं सवाल
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मदर टेरेसा के 1997 में दिवंगत होने के बाद भी उन पर विवाद होते रहे. जिस कथित ‘चमत्कार’ के कारण 2003 में वेटिकन ने उन्हें धन्य घोषित किया उसे तर्कवादियों ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था. कहा गया था कि पेट के ट्यूमर से जूझ रही पश्चिम बंगाल की एक महिला मोनिका बेसरा ने एक दिन अपने लॉकेट में मदर टेरेसा की तस्वीर देखी और उनका ट्यूमर पूरी तरह से ठीक हो गया.
मदर टेरेसा के चमत्कार और संत बनाने पर उठते रहे हैं सवाल
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लेकिन कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन डॉक्टरों ने मोनिका बेसरा नाम की इस महिला का इलाज किया उनका कहना है कि मदर टेरेसा की मृत्यु के कई साल बाद भी मोनिका दर्द सहती रही. हालांकि, वेटिकन के धर्मगुरूओं ने इस कथित चमत्कार को मान्यता दे दी थी. कई लोग हैं जो मानते हैं कि मदर टेरेसा को संत बनाने के पीछे वेटिकन की मजबूरी भी है. चर्चों में लोगों का आना लगातार कम हो रहा है और ईसाई धर्म और इसके केंद्र वेटिकन में लोगों का विश्वास लौटाने के लिए ऐसा कदम उठाना जरूरी था.
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आपातकाल की तारीफ, गर्भपात की आलोचना: इससे पहले 1975 में भी मदर टेरेसा का एक बयान विवादों में रहा था. इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल पर उनका कहना था कि इससे लोग खुश हैं क्योंकि नौकरियां बढ़ी हैं और हड़तालें कम हुई हैं. गर्भनिरोधक उपायों और गर्भपात पर भी मदर टेरेसा के रुख ने आलोचनाएं बटोरीं. उनका मानना था कि संयम गर्भनिरोधक उपाय अपनाने से बेहतर है और गर्भपात तो सबसे बड़ी बुराई है जो हत्या के बराबर है. परिवार नियोजन और नारीवाद के पैरोकारों ने इस पर उनकी खूब आलोचना की थी.
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आखिरी सांसों के वक्त बापतिस्मा: बपतिस्मा यानी पवित्र जल छिड़ककर ईसाई धर्म में दीक्षा देने का कर्मकांड. आरोप लगे कि न तो उनका संगठन लोगों को यह बताता है कि इसका मतलब क्या है और न ही वह इसका ख्याल करता है कि उस व्यक्ति की धार्मिक आस्था क्या है. इस बारे में 1992 में अमेरिका के कैलीफोर्निया में एक भाषण के दौरान मदर टेरेसा का कहना था, ‘हम उस आदमी से पूछते हैं, क्या तुम वह आशीर्वाद चाहते हो जिससे तुम्हारे पाप क्षमा हो जाएं औऱ तुम्हें भगवान मिल जाए? किसी ने कभी मना नहीं किया.’
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अरूप चटर्जी की चर्चित किताब मदर टेरेसा : द फाइनल वरडिक्ट में यह कहा गया है कि मिशनरीज ऑफ चैरिटीज को गरीबों की मदद करने के लिए अकूत पैसा मिला लेकिन, उसका एक बड़ा हिस्सा उन्होंने खर्च ही नहीं किया. चटर्जी ने इस पर भी सवाल उठाया कि मिशनरीज ऑफ चैरिटीज ऐसे लोगों से भी फंडिंग लेती थीं जिनकी आय के स्रोत संदिग्ध थे. इनमें भ्रष्ट तानाशाह और बेईमान कारोबारी भी शामिल थे. जैसे उन्होंने चार्ल्स कीटिंग से भी पैसा लिया जो अमेरिका में अपने घोटाले से कुख्यात थे.

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जीवनदान या मृत्युदान का मिशन: ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लैंसेट के सम्पादक डॉ रॉबिन फॉक्स ने भी 1991 में एक बार मदर के कोलकाता स्थित केंद्रों का दौरा किया था. फॉक्स ने पाया कि वहां साधारण दर्दनिवारक दवाइयां तक नहीं थीं. उनके मुताबिक इन केंद्रों में बहुत से मरीज ऐसे भी थे जिनकी बीमारी ठीक हो सकती थी. लेकिन वहां सबको इसी तरह से देखा जाता था कि ये सब कुछ दिनों के मेहमान हैं.
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द मिशनरी पोजीशन : मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस: ब्रिटेन में जन्मे लेखक क्रिस्टोफर हिचेंस द्वारा लिखी गई इस किताब में हिचेंस का कहना था कि मीडिया ने मदर टेरेसा का मिथक गढ़ दिया है जबकि सच्चाई इसके उलट है. लेख का सार यह था कि गरीबों की मदद करने से ज्यादा दिलचस्पी मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की इसमें थी कि उनकी पीड़ा का इस्तेमाल करके रोमन कैथलिक चर्च के कट्टरपंथी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाए. हिचेंस उन्हें एक धार्मिक रुढ़िवादी, एक राजनीतिक गुप्तचर, एक कट्टर उपदेशक और दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एजेंट करार देते थे. इन्होनें मदर टेरेसा पर कई बड़े सवाल खड़े करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री 'हेल्स एंजेल' भी बनाई थी.
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बीमारों की सेवा कम, प्रोपोगेंडा ज्यादा: मदर टेरेसा कहा करती थीं कि वो कलकत्ता की सड़कों और गलियों से बीमार पड़े लोगों को उठाकर अपने सेंटर में लाती हैं. जबकि यह बात पूरी तरह झूठ पाई गई थी. मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी में काम कर चुके डॉक्टर अरूप चटर्जी ने अपनी किताब ‘मदर टेरेसा: द फाइनल वरडिक्ट’ में बताया है कि यह दावा गलत था. जब कोई फोन करके बताता था कि फलां जगह कोई बीमार पड़ा है तो ऑफिस से जवाब दिया जाता था कि 102 नंबर पर फोन कर लो. चटर्जी के मुताबिक संस्था के पास कई एंबुलेंस थीं, लेकिन इनमें ननों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता था. मिशनरीज ऑफ चैरिटी हमेशा दावा करती रहीं कि उनकी संस्था कलकत्ता में रोज हजारों गरीबों को खाना खिलाती है. लेकिन यह बात भी समय के साथ फर्जी साबित हो गई थी. दरअसल संस्था के किचन में एक दिन में सिर्फ 300 लोगों का ही खाना बनता था. इतने के लिए ही राशन भी मंगाया जाता था। यह खाना सिर्फ उन लोगों को मिलता था जिन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया हो.
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मजबूर मां-बाप से हजारों बच्चे छीने: मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने भारत में हजारों गरीब मां-बाप की मजबूरी का फायदा उठाया. अपनी किताब में डॉक्टर अरूप चटर्जी ने लिखा है कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी बीमार बच्चों की मदद करती थीं, लेकिन तभी जब उनके मां-बाप एक फॉर्म भरने के लिए तैयार हो जाते थे. इसमें लिखा होता था कि वे बच्चों से अपना दावा छोड़कर उन्हें मदर की संस्था को सौंपते हैं. मजबूर मां-बाप बच्चों के इलाज के नाम पर उन्हें मिशन में छोड़कर चले जाते थे. इसके बाद उन्हें अपने बच्चों से मिलने तक की इजाज़त नहीं होती थी. इन बच्चों का ब्रेन वॉश करके उन्हें कट्टर ईसाई बना दिया जाता था.
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पूर्वोत्तर के राज्यों मे धर्म परिवर्तन से बढ़ा चरमपंथ: मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने स्थानीय आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवाया. जिसके कारण यहां बसे तमाम समुदायों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई.
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