फाल्गुन की एकादशी को यहां बाबा विश्वनाथ की पालकी निकलती है और लोग उनके साथ रंगों का त्योहर मनाते हैं. ऐसी मान्यता है कि बाबा उस दिन पार्वती का गौना कराकर दरबार लौटते है. दूसरे दिन शंकर अपने औघड़ रुप में श्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेलते है.