लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी/एसटी समुदाय को मिलने वाले आरक्षण की समय सीमा बढ़ाने के लिए 104वें संविधान संशोधन का सुप्रीम कोर्ट परीक्षण करेगा. इसके लिए पांच जजों की संविधान पीठ गठित कर दी गई है, जो 21 नवंबर से इस पर सुनवाई शुरू करेगी.
सुप्रीम कोर्ट चार साल पहले यानी 2019 में किए गए 104वें संविधान संशोधन का परीक्षण करेगा. इसके जरिए लोकसभा और विधानमंडलों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण लाभ की समयसीमा को अगले 10 साल के लिए बढ़ा दिया गया था और एंग्लो इंडियन आबादी को दिया गया आरक्षण खत्म कर दिया गया.
21 नवंबर से शुरू होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वो ये भी देखेगा कि क्या अनुच्छेद 334 के तहत आरक्षण की निर्धारित अवधि को बढ़ाने का संशोधन संवैधानिक वैध है? इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ की अगुवाई सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ करेंगे. पीठ के अन्य न्यायाधीशों में जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा होंगे. संविधान पीठ 21 नवंबर से इस मामले में सुनवाई शुरू करेगी.
एंग्लो-इंडियन को नामित करता था राष्ट्रपति
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 331 के अनुसार, एंग्लो-इंडियन समुदाय के सदस्यों को लोकसभा के चुनाव के लिए राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जा सकता है. अगर पूरी लोकसभा में उनका कोई भी प्रतिनिधित्व ना हो.
आरक्षण की समय सीमा बढ़ाकर 80 साल की गई
भारतीय संविधान के 104वें संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नागरिकों के लिए सीटें उपलब्ध होने की समय अवधि को 70 से बढ़ाकर 80 वर्ष कर दिया. एंग्लो-इंडियन के पास अब लोकसभा या राज्य विधानसभाओं में कोई आरक्षित सीट नहीं है.