कर्नाटक में मुस्लिम बोम्मई को बचाएंगे?
कर्नाटक फतह कौन करेगा? ये सवाल फिलहाल देश की राजनीति का मुख्य प्रश्न बना हुआ है. वोटिंग में महज 21 दिन रह गए हैं और तमाम केंद्रीय मंत्रियों का काफिला कर्नाटक की ओर मुड़ चुका है. बीजेपी ने आज अपने स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी की और आज ही राज्य के कई बड़े राजनेताओं ने नामांकन भी दाखिल किया. मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई शिवगांव पहुंचे. वो 2008 से शिवगांव जीतते आ रहे हैं. उन्होंने रोड शो भी किया जहां उनके साथ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अभिनेता किच्चा सुदीप भी थे.
सीएम बोम्मई के अलावा आज बीजेपी छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए जगदीश शेट्टार और बीएस येदियुरप्पा के बेटे बी वाई विजयेंद्र ने भी नामांकन का पर्चा भरा. पीएम मोदी भी 21 तारीख से कर्नाटक में रैलियों करेंगे. बीजेपी का फोकस इस बार भी लिंगायत समुदाय पर ही है जो पिछले 30 सालों से उसका मजबूत वोट बैंक है. वहीं कांग्रेस वोक्कालिगा के साथ नजर आ रही है. खुद कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी इसी समाज से आते हैं. हालांकि, वोक्कालिगा समुदाय के बीच पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल सेक्युलर का मांड्या बेल्ट में मजबूत प्रभाव है.
वहीं राज्य में बीजेपी भ्रष्टाचार के घोटालों से भी हिली हुई है. तो हम विस्तार में बीजेपी के सामने क्या क्या चैलेंजेज हैं उसपर बात करेंगे लेकिन उससे पहले उन पांच सीटों की बात जिस पर इस बार सबकी नज़र रहने वाली है, सुनिए 'दिन भर' में
जाति जनगणना से बीजेपी को कितना नुक़सान?
हिंदुत्व.... इस पटरी पर बीजेपी की राजनीति 1990 से दौड़ रही है. अब उसमें पिछले 10 सालों से राष्ट्रवाद का तड़का भी लगा है लेकिन मूलभूत मुद्दा अभी भी हिंदुत्व ही है जिस पर बीजेपी फ्रंटफुट पर खेलती है. 2014 के बाद से ही कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टी एक मुद्दे के तलाश में है जो बीजेपी के हिंदुत्व पर हावी पड़े सके. जातिगत जनगणना विपक्ष के लिए ऐसा ही एक मुद्दा है.
2024 लोकसभा चुनाव करीब है. भले विपक्ष गठबंधन को एक रूप अबतक न दे सका हो लेकिन जातिगत जनगणना पर वो साथ आता दिखाई पड़ता है. जदयू, राजद, सपा, कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, एनसीपी, आम आदमी पार्टी.. फेहरिस्त लंबी है जो इस पर साथ दिखाई पड़ते हैं. तो अब इससे पहले कि बीजेपी के लिए ये मुद्दा गले की फांस बन जाए वो इसका इलाज़ तलाशने में जुट गई है. तो जाति जनगणना को किनारे लगाने के लिए बीजेपी के पास कौन कौन से ऑप्शन्स है, सुनिए 'दिन भर' में
पति-पत्नी की बदलेगी परिभाषा?
समलैंगिक शादियों को कानूनी रूप दिया जाए या नहीं इस पर आज लगातार दूसरे दिन बहस हुई. सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने नया एफिडेविट दाखिल किया और कोर्ट से कहा कि मामले में राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों को भी पार्टी बनाया जाए. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो इस मामले में सुनवाई जारी रखेगा. याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकील मुकुल रोहतगी ने कानून से संचालित समाज में बदलाव के बारे में बात की. उन्होंने कहा, सेम सेक्स मैरिज करने वाले कपल्स के माता पिता ने भी संघर्षों के बाद उनके रिश्तों को स्वीकार कर लिया है. साथ ही उन्होंने नेपाल सुप्रीम कोर्ट और अमेरिकी कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया.
दिल्ली हाईकोर्ट समेत अलग-अलग अदालतों में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर हुई थीं. इन याचिकाओं में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी. पिछले साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में पेंडिंग दो याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा था.
अब कल ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ये भी दलील रखी थी कि समलैंगिक शादी की मांग केवल शहरी एलीट क्लास के लोगों की है, तो आज कोर्ट ने इसपर सरकार से आंकड़े मांग लिए, कि किस आंकड़े के बिनाह पर आप ये बात कह रहे हैं. तो आज सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की ओर से क्या दलीलें रखीं गई और कोर्ट का रुख उसपर क्या रहा, सुनिए 'दिन भर' में
बढ़ती आबादी कैसे थमेगी?
बचपन से हम जनरल नॉलेज के इस सवाल से टकराते आये हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश कौन सा है? जवाब हुआ करता था - चीन. लेकिन इस जवाब को बदलने का वक़्त आ गया है क्योंकि आबादी के मामले में भारत ने चीन को पछाड़ दिया है. यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड यानी UNFPA की एक रिपोर्ट आई है - द स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट 2023, इसके मुताबिक, भारत की जनसंख्या 142 करोड़ 86 लाख तक पहुंच गई है, जबकि चीन की आबादी 142 करोड़ 57 लाख है, यानि दोनों देशों की जनसँख्या में 29 लाख का अंतर है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की 25 प्रतिशत आबादी 0-14 साल के बीच की है, वहीं 26 प्रतिशत लोगों की उम्र 10 से 24 साल के बीच है, जबकि लगभग 68 प्रतिशत जनसंख्या 15-64 आयु वर्ग में हैं और 65 से ऊपर के लोग सिर्फ 7 प्रतिशत हैं. ये बात भी सामने आई है कि चीन में बच्चे पैदा करने की दर कम हुई है और वो इस साल नेगेटिव में दर्ज की गई. हालाँकि, लाइफ एक्सपेक्टेंसी के मामले में चीन, भारत से बेहतर कर रहा है. लेकिन ये आंकड़े कुछ अहम सवाल भी खड़े करते हैं, सुनिए 'दिन भर' में