scorecardresearch
 

प्रोफेसर डीएन झा का निधन, प्राचीन इतिहास को ले आए थे बहस के केंद्र में

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर द्विजेंद्र नारायण झा का गुरुवार को निधन हो गया. 81 वर्ष के डीएन झा पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. प्रोफेसर डीएन झा प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ माने जाते थे. प्रोफेसर डीएन झा अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे.

Advertisement
X
प्रोफेसर डीएन झा का गुरुवार को निधन हो गया (फाइल फोटो)
प्रोफेसर डीएन झा का गुरुवार को निधन हो गया (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • प्रोफेसर डीएन झा का गुरुवार को निधन
  • प्राचीन भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ थे
  • साक्ष्यों की बदौलत कहते रहे अपनी बात

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर द्विजेंद्र नारायण झा का गुरुवार को निधन हो गया. 81 वर्ष के डीएन झा पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. प्रोफेसर डीएन झा ने प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास पर काम किया. वह साक्ष्यों की बदौलत अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे. 

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग में चेयरमैन रहे प्रोफेसर डीएन झा को प्राचीन इतिहास और मध्यकालीन भारत पर विशेषज्ञता हासिल थी. उन्होंने हमेशा भारतीय इतिहास की विकृतियों को रेखांकित किया. 

प्रोफेसर डीएन झा ने गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण काल' कहे जाने को चुनौती दी. उन्होंने यह भी दावा किया कि गाय को बहुत बाद के समय में पवित्र माना जाने लगा, उन्होंने भारतीय इतिहास में धार्मिक हिंसा का दस्तावेजीकरण भी किया. लिहाजा, डीएन झा के काम और लेखन आधुनिक भारत की राजनीति में हमेशा बहस की केंद्र में रहे.   

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पढ़ाने वाले इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं कि डीएन झा ऐतिहासिक तथ्यों और एम्पिरिकल एविडेंस के तरफदार थे. वह बिना किसी साक्ष्य के अपनी बात नहीं कहते थे. अपने साक्ष्यों की बदौलत ही वह भारतीय इतिहास की विकृत धारणाओं को हमेशा चुनौती देते रहे.   

Advertisement

डीएन झा ने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से इतिहास में ग्रेजुएट किया था और पटना यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री ली थी. अपने तीन दशक से अधिक के करियर में डीएन झा प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास के सांप्रदायिक रंग के खिलाफ जीवनभर लड़ते रहे. वह साक्ष्यों की बदौलत भारतीय इतिहास की विकृतियों को उजागर करते रहे.

प्रोफएसर डीएन झा ने 1991 में तीन अन्य इतिहासकारों के साथ मिलकर 'बाबरी मस्जिद आर रामाज बर्थप्लेस? हिस्टोरियन्स रिपोर्ट टू द इंडियन नेशन' रिपोर्ट तैयार की थी. सरकार को सौंपी गई इस रिपोर्ट में पुरातात्विक और अन्य साक्ष्यों के आधार पर कहा गया था कि बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर नहीं था. इस रिपोर्ट में ASI के प्रस्तुत निष्कर्षों को खारिज किया गया था. हालांकि 2019 में सुप्रीम कोर्ट में इन इतिहासकारों की इस रिपोर्ट को उनकी राय कहते हुए खारिज कर दिया था.

प्रोफेसर डीएन झा की 'द मिथ ऑफ होली काउ' नाम किताब भी काफी चर्चित रही. 'रीथिन्किंग हिंदू आइडेंटिटी' नाम से प्रकाशित किताब भी काफी लोकप्रिय रही. इसमें उन्होंने हिंदू धर्म को दूसरे धर्मों की अपेक्षा नया बताया था. 'द मिथ ऑफ होली काउ' में डीएन झा ने बताया था कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था और प्राचीन भारत में स्वर्ण युग था ये विचार उन्नीसवीं सदी के आखिर में ही सामने आया था. प्रोफेरस डीएन झा के मुताबिक ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि भारतीय इतिहास में कोई स्वर्ण युग नहीं था. 

Advertisement


 

Advertisement
Advertisement