
पारंपरिकता को आधुनिक मशीनों-औजारों का सहारा मिल जाए, तो क्या कमाल किया जा सकता है, ये कोई महाराष्ट्र के सोलापुर के शरनप्पा शिवाजी कुम्हार से पूछे. 45 साल के शरनप्पा अपने चार भाइयों के साथ मिलकर सोलापुर के नीलम नगर की इंग्ले बस्ती में कुम्हार वर्कशॉप चलाते हैं.
शरनप्पा को ये विरासत उनके पिता से मिली. पारंपरिक हुनर तो पीढ़ियों से चला आ रहा था. वही पुराने तरीके से पहले मिट्टी को पैरों से रौंदना, लकड़ी के चाक को घुमाते हुए गीली मिट्टी से बर्तनों को आकार देना, फिर उन्हें भट्टी में तपाना. शरनप्पा बचपन से ये देखते आ रहे थे और इसमें माहिर भी हो गए. लेकिन ऐसे पारंपरिक तरीके में समय बहुत लगता है और कम ही मिट्टी के बर्तन बन पाते. यानी सीमित ही कमाई हो पाती.
शरनप्पा तीसरी क्लास तक ही पढ़े
शरनप्पा सिर्फ तीसरी क्लास तक पढ़े हैं लेकिन वे हमेशा इसी उधेड़बुन में रहते थे कि अगर पारंपरिक तरीकों को विज्ञान और तकनीक का सहारा मिल जाए तो कम समय में ही, कम मानव संसाधन से अधिक उत्पादन किया जा सकता है. इलेक्ट्रिक पॉटर चाक की मदद से लकड़ी के चाक की तुलना में अधिक तेजी से काम किया जा सकता है. इसके अलावा अनुमिश्रक मशीन (Blunger Machines) का इस्तेमाल मिट्टी को मिलाने के लिए किया जाता है. यह मशीन महज एक घंटे में ही 100 किलो मिट्टी को लेप में बदल सकती है. हाथों से किया जाए तो इस काम में कहीं ज्यादा समय लगे.

हालांकि शरनप्पा मिट्टी के बर्तनों को सुखाने के लिए इलेक्ट्रिक भट्टी का इस्तेमाल नहीं करते. इसके लिए वे लकड़ी की भट्टी का ही इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि इलेक्ट्रिक भट्टी से तापमान बहुत अधिक हो जाता है, इसकी तुलना में लकड़ी की भट्टी को ही अपने बर्तनों के लिए उपयुक्त मानते हैं.
महाराष्ट्र समेत कई राज्यों की मिट्टी का इस्तेमाल
शरनप्पा ने बताया कि वो महाराष्ट्र के अलावा देश के अन्य राज्यों जैसे कि गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की मिट्टी को एक साथ मिलाकर अपने उत्पाद बनाते हैं.

इस वर्ष सिर्फ कोरोना काल में कुम्हार परिवार ने मिट्टी से बने दीए, बर्तन आदि बेचकर 30 लाख रुपये का कारोबार किया. शरनप्पा के मुताबिक जब से उनके काम को आधुनिकता का जोड़ मिला है, साल भर में 60 लाख रुपये का कारोबार हो रहा है. सोलापुर में तकरीबन 100 कुम्हार परिवार हैं लेकिन गिनेचुने लोगों का ही कारोबार चमक रहा है. गणेश उत्सव, दिवाली, मकर संक्रांति पर मिट्टी के बर्तनों, दीयों आदि की मांग बढ़ जाती है.
मिट्टी के बर्तनों की भारी डिमांड
मिट्टी के बर्तनों की डिमांड अब हाई सोसाइटी में भी बढ़ने लगी है. जैसे कि गिलास, प्लेट, कप, जग, बाउल्स जैसी क्रॉकरी. इसके अलावा पौधों के लिए पॉट्स की मांग के साथ मिट्टी के बड़े डेकोरेटिव पीस भी अब ड्राइंग रूम्स की शोभा बढ़ाते दिखते हैं. इसके अलावा अब कुछ घरों में हांडी जैसे मिट्टी के बर्तनों में ही खाना बनाने का प्रचलन भी बढ़ रहा है.
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शरनप्पा बताते हैं कि उन्होंने केंद्र सरकार की स्कीम के तहत इस साल के शुरू में पांच लाख रुपये का लोन लिया लेकिन फिर लॉकडाउन शुरू हो गया. सब कुछ बंद होने पर भी शरनप्पा और उनके भाई अपने काम में जुटे रहे. इसका उन्हें लाभ भी हुआ. उनकी वर्कशॉप से अच्छा कारोबार हुआ और पर्याप्त स्टॉक होने से त्योहारी सीजन में इसका लाभ मिला.
शरनप्पा और उनके भाइयों की कामयाबी को देखते हुए सोलापुर में उन्हें कॉलेज के छात्रों को आधुनिक कुम्हार व्यवसाय पर टिप्स देने के लिए बुलाया जाता है. मिट्टी से सोना बनाने वाले अपने परिवार की सफलता को देख शरणाप्पा का बेटा विकास भी अब कारोबार को बढ़ाने में सहयोग दे रहा है. 12वीं में पढ़ने वाला विकास सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम) के जरिए अपनी वर्कशॉप में बने उत्पादों की मार्केटिंग की रणनीति पर काम कर है. विकास का कहना है कि नौकरी करके खुद का पेट मुश्किल से भरता है लेकिन इस व्यवसाय से दर्जनों को रोजगार दिया जा सकता है.
(सोलापुर में विजय बाबार के इनपुट्स के साथ)