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महाराष्ट्र: आठ महीने की सत्ता ने बदली साठ साल के हो चुके उद्धव ठाकरे की छवि

20 साल पहले उद्धव ठाकरे ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली थी. उद्धव का जन्म 27 जुलाई 1960 में हुआ था. इस तरह उन्होंने अपनी जिंदगी के 60 साल का सफर पूरा कर लिया है. साल 2000 से पहले तक उद्धव ठाकरे राजनीति से दूर रहे.

शिवसेना प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे शिवसेना प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे

  • उद्धव ठाकरे ने जिंदगी के 60 साल का सफर पूरा किया
  • उद्धव ठाकरे ने साल 2000 में सियासत में कदम रखा था

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक अलग मुकाम हासिल किया है. उद्धव ठाकरे अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बालासाहब ठाकरे का सपना साकार करने के लिए कांग्रेस-एनसीपी से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री बने. बाल ठाकरे हमेशा मराठी गौरव और हिंदुत्व का प्रतीक रहे, लेकिन उद्धव ठाकरे के सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने के बाद शिवसेना के तेवर-सोच और स्वभाव तीनों बदले हैं. शिवसेना अब हार्ड कोर हिंदुत्व की नहीं बल्कि 'सर्वधर्म' की दिशा में आगे बढ़ रही है और उत्तर भारतीयों को लेकर भी अपना नजरिया बदल दिया है.

20 साल पहले उद्धव ठाकरे ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली थी. उद्धव का जन्म 27 जुलाई 1960 में हुआ था. इस तरह उन्होंने अपनी जिंदगी के 60 साल का सफर पूरा कर लिया है. साल 2000 से पहले तक उद्धव ठाकरे राजनीति से दूर रहे. वह शिवसेना के अखबार सामना का काम देखते थे. बाल ठाकरे की सेहत खराब हुई तो उद्धव राजनीति में एक्टिव हुए और पार्टी का कामकाज देखने लगे. उनका राजनीतिक सफर पार्टी और परिवार के लिहाज से काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा.

बाल ठाकरे के बाद शिवसेना का उत्तराधिकारी कौन होगा? इसके लिए उद्धव ठाकरे को अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से लड़ाई भी लड़नी पड़ी. इसके साथ ही पार्टी में एक गुट का विरोध भी सहना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उद्धव को शिवसेना के राजनीतिक वजूद को महाराष्ट्र में बचाए रखने के लिए बीजेपी से भी दो-दो हाथ करने पड़े हैं. बीजेपी-शिवसेना हिंदूवादी समान विचारधारा के कारण 25 साल साथ रहे, लेकिन 2019 में सत्ता की कुर्सी के लिए अलग होना पड़ा और वैचारिक विरोध रहे कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर शिवसेना को सरकार बनानी पड़ी.

cm-uddhav_072720100147.jpgउद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे

शिवसेना का 90 के दशक में आक्रामक रूप था

बता दें कि शिवसेना 1990 के दशक में आक्रामक, भड़कीले और कट्टर हिंदुत्व की छवि वाले राजनीतिक संगठन के तौर पर जानी जाती थी. राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवा से लेकर बाबरी विध्वंस में शिवसेना प्रमुख भूमिका में रही है. 1991 में पाकिस्तान और भारत के मैच को रोकने के लिए मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद देने वाली शिवसेना पिछले कुछ सालों में अपनी हिंसक छवि से अलग रुख अख्तियार कर चुकी है. इसका बड़ा श्रेय उद्धव ठाकरे को ही जाता है.

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उद्धव ठाकरे के एक फैसले ने न सिर्फ सबकों चौंका दिया बल्कि गठबंधन के समीकरणों को बदल दिया. शिवसेना सिर्फ बीजेपी से ही अलग नहीं बल्कि कट्टर हिंदुत्व की सोच से भी बाहर निकली और कांग्रेस-एनसीपी के साथ हाथ मिलाया. एनसीपी के नवाब मलिक, जो 1998 में बाल ठाकरे के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे, अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली कैबिनेट में मंत्री हैं. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में मुस्लिम समुदाय को 5 फीसदी आरक्षण देने का वादा भी शामिल है, जिस पर शिवसेना ने कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई.

शिवसेना का बदला नजरिया

शिवसेना एक दौर में मुस्लिम विरोधी के तौर पर जानी जाती थी, लेकिन मौजूदा दौर में उसकी सोच बदली हुई दिखी है. कोरोना संक्रमण मामले में बीजेपी नेता तबलीगी जमात को दोष देने में जुटे हुए थे. ऐसे में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा कोरोना मामले सामने आने के बाद भी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तबलीगी जमात को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की बल्कि उन्होंने सांप्रदायिक वायरस को कोरोना वायरस की ही तरह खतरनाक बताकर सबको हैरान कर दिया था. उन्होंने यहां तक कहा था कि यह कोविड-19 वायरस कोई धर्म नहीं देखता है.

एनआरसी के खिलाफ उद्धव

महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज उद्धव ठाकरे सरकार सीएए के समर्थन में थी, लेकिन एनआरसी के खिलाफ तेवर अख्तियार किए हुए थी. शिवसेना ने कहा था कि एनआरसी आया है और आपको भी नागरिकता सिद्ध करने के लिए लाइन में खड़ा रहना होगा. सीएम उद्धव ने कहा था, 'एनआरसी केवल मुसलमानों के लिए तकलीफदायक नहीं है. अगर बीजेपी एनआरसी लाती है तो इससे हिंदुओं और अन्‍य धर्म के लोगों को दिक्‍कत होगी. देश के सभी नागरिकों को अपनी नागरिकता साबित करनी होगी.'

2014 के बाद शिवसेना की लाइन बदली

दरअसल, 2014 के आसपास शिवसेना की राजनीति ने उदारवादी मोड़ लेना शुरू कर दिया, क्योंकि मुंबई की जनसांख्यिकी धीरे-धीरे बदल गई. शिवसेना ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में अपनी छवि को नरम किया और युवा मतदाताओं से उनकी भाषा में बोलने के लिए अपने बेटे आदित्य को आगे बढ़ाया. आदित्य ठाकरे के प्रभुत्व के चलते ही शिवसेना ने वेलेंटाइन डे का विरोध प्रदर्शन बंद कर दिया.

uddhav-cm_072720100531.jpgउद्धव ठाकरे गठबंधन के नेताओं के साथ

शिवसेना ने गुजराती समुदाय के नेताओं को शामिल किया, छठ पूजा आयोजित की और मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावों में उतारा और अपनी सरकार में मंत्री बनाया. हालांकि, उद्धव ठाकरे राम मंदिर को अपने से जोड़े रखना चाहती है. इसीलिए साल की शुरुआत में उद्धव अयोध्या गए थे क्योंकि पार्टी अपने मूल दक्षिणपंथी मतदाताओं को बीजेपी के हाथों नहीं खोना चाहती है. शिवसेना के नेता उनके बारे में बयान दे रहे हैं जैसे मंदिर के भूमि पूजन के लिए वे जा रहे हैं, क्योंकि पार्टी बीजेपी को केवल श्रेय नहीं लेने देना चाहती.

सत्ता में होने की अपनी मजबूरी

मराठी मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने वाली शिवसेना अब खुद सत्ता में है. इसीलिए सड़क पर संघर्ष किसके खिलाफ करेगी. शिवेसना के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इससे पहले हम लोगों को उस मुद्दे पर ध्यान देने के लिए सड़कों पर आना पड़ा जो हम उठा रहे हैं. अब मैं एक कॉल कर सकता हूं और काम पूरा हो जाता है. शिवसेना उन्हीं अड़चनों से बंधी है जो किसी भी सत्ताधारी पार्टी की है. उन्होंने कहा कि हमें प्रशासन या किसी और सरकार के लिए परेशानी नहीं खड़ी करनी चाहिए.

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उदाहरण के तौर पर, इस जुलाई महीने की शुरुआत में, शिवसेना के विधायक प्रताप सरनाईक ने राज्य के गृह मंत्री को पत्र लिखकर अरब सागर में प्रस्तावित छत्रपति शिवाजी स्मारक पर मजाक करने के लिए एक स्टैंड-अप कॉमेडियन की गिरफ्तारी की मांग की. वहीं, पहले होता तो विरोध केवल राज्य के गृह मंत्री को पत्र द्वारा नहीं, बल्कि सड़क पर प्रदर्शनों द्वारा दर्ज किया गया होता. उद्धव सीएम हैं और अगर शिवसेना आंदोलन करती तो सरकार पर सवाल खड़े होते.

बाला साहेब ठाकरे के दौर के नेता साइडलाइन

बाल ठाकरे के दौर के पुराने लोग फिलहाल या तो चुप हो गए या शिवसेना के नए स्वरूप में ढल गए हैं. शिवसेना के कुछ पुराने लोग और हार्डकोर नेता हैं, जैसे मनोहर जोशी, लीलाधर डाके और दिवाकर रावते, इनकी पार्टी में अब पहले जैसे हैसियत नहीं रह गई है. इसके अलावा शिवसेना के कई अन्य पुराने नेताओं का निधन हो गया है. इसमें मधुकर सरपोतदार जैसे नेता शामिल हैं, जिन्हें 1993 के दंगों के मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया थ. मोरेश्वर सेव, जिन्होंने बाबरी मस्जिद के लिए शिवसेना के धड़े का नेतृत्व किया और प्रमोद नवलकर और दत्ता नलवाडे सहित अन्य लोग शामिल हैं.

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