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गोडसे से जुड़े सीन पर कैंची, इस फिल्म में ही लिख दी गई थी शिंदे की बगावत की स्क्रिप्ट, पढ़ नहीं पाए उद्धव

महाराष्ट्र में चंद हफ्ते पहले एक फिल्म आई थी धर्मवीर: मुक्काम पोस्ट. एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरु आनंद दिघे की जिंदगी पर बनी इस फिल्म में कई संदेश ऐसे छिपे थे जो महाराष्ट्र में आने वाले राजनीतिक भूचाल का संकेत दे रहे थे. लेकिन उद्धव ठाकरे की नजरें शांत दिखने वाली शिवसेना में बगावत की लहरों को नहीं देख पाई.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (फोटो-पीटीआई) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (फोटो-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • फिल्म में छिपे संदेश को नहीं पढ़ पाए उद्धव
  • आनंद दिघे की जिंदगी पर बनी है फिल्म
  • फिल्म के कई सीन वास्तविक जिंदगी पर आधारित

महाराष्ट्र की राजनीति में फिलहाल उबाल थम सा गया है. पिछले कुछ दिनों में राज्य में एकनाथ शिंदे की बगावत की चर्चा हुई. इस दौरान चर्चा में एक फिल्म भी थी. इस फिल्म का नाम था धर्मवीर: मुक्काम पोस्ट ठाणे. ये फिल्म एकनाथ शिंदे के राजनीतिक गुरु आनंद दिघे की जिंदगी पर आधारित थी. कहा जाता है कि इस फिल्म में महाराष्ट्र की राजनीति में आए हलचल के संदेश छिपे हुए थे. इन संदेशों में एकनाथ शिंदे का संकेत छिपा था कि अब बगावत का समय हो चुका है. 

आजतक ने इस फिल्म से जुड़े कई बड़े नामों से बात की और इस फिल्म में छिपे उन संदेशों को समझने की कोशिश की. इस फिल्म में छिपे संदेश निश्चित रूप से चौकाने वाले हैं. 

योजनाबद्ध तरीके से तय किया गया मूवी रिलीज का टाइम 

फिल्म धर्मवीर: मुक्काम पोस्ट ठाणे महाराष्ट्र में आए राजनीतिक हलचल से मात्र एक महीना पहले महाराष्ट्र में रिलीज किया गया. यूं तो कहा जाता है कि इस फिल्म में शिवसेना नेता आनंद दिघे की जिंदगी को दिखाया गया है लेकिन इस फिल्म के ज्यादातर हिस्से में एकनाथ शिंदे के व्यक्तिव को भव्य और विशाल अंदाज में पेश किया गया है. इस फिल्म में काम करने का ऑफर पाने वाले एक अभिनेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा कि उसे इस फिल्म को इनकार करना पड़ा क्योंकि उसके पास तारीख की समस्या थी. लेकिन प्रोड्यूसर किसी भी हाल में इस फिल्म को मई में रिलीज करना चाहते थे. ये मूवी मार्च में बननी शुरू हुई और रिकॉर्ड टाइम में पूरी कर ली गई. इस अभिनेता ने कहा, "मुझे आश्चर्य हुआ कि निर्माता फिल्म को मई में रिलीज करना चाह रहे थे, जो न तो दिघे के जन्म जयंती और न ही पुण्यतिथि के साथ मेल खाता है, यहां तक ​​कि तब शिवसेना का स्थापना दिवस भी आस-पास नहीं था."

शिंदे, जिन्हें मुख्य रूप से ठाणे और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नेता के रूप में देखा जाता था, ने कद्दावर मराठी फिल्म डायरेक्टर प्रवीण तारडे द्वारा निर्देशित इस फिल्म का पूरे महाराष्ट्र में जोर-शोर से प्रचार किया. 

बाला साहेब का आक्रामक हिन्दुत्व

फिल्म धर्मवीर: मुक्काम पोस्ट ठाणे शिवसेना के कद्दावर नेता आनंद दिघे की जिंदगी के इर्द-गिर्द घुमती है. इस पिक्चर में आनंद दिघे के हिन्दुत्व के हुंकार पर खूब फोकस किया गया है. इस मूवी में नब्बे के दशक में हुए राबोदी और भिवंडी के सांप्रदायिक दंगों को प्रमुखता से दिखाया गया है. इसके जरिए शिवसेना (बाला साहेब) के कट्टर हिंदुत्ववादी छवि को उभारने की कोशिश की गई है. बता दें कि बगावत के बाद एकनाथ शिंदे लगातार लोगों के सामने इस बात को रख रहे हैं कि कैसे उद्धव ठाकरे के नेतृ्त्व में शिवसेना बाला साहेब ब्रांड की हिन्दुत्व से भटक गई. 

नाथूराम गोडसे का नाटक

मराठी नाटक 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम की जिंदगी पर आधारित है. 90 के दशक में ये नाटक विवादों में आ गया था. आरोप है कि इस नाटक में गोडसे के चरित्र का महिमामंडन किया गया है. शिवसेना ने तब नाटक के मंचन का खुलकर समर्थन किया था और आनंद दिघे अपने प्रभाव क्षेत्र ठाणे में इस नाटक का मंचन कराने में सबसे आगे थे. 

इस बारे में फिल्म धर्मवीर: मुक्काम पोस्ट ठाणे में पूरे विवाद और इसमें शिवसेना की भूमिका को लेकर एक पूरा दृश्य फिल्माया गया है. यहां तक कि 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' में नाथूराम की भूमिका निभाने वाले अभिनेता शरद पोंकसे ने भी इसमे रोल किया है. हालांकि फिल्म जब एडिट होकर दर्शकों के सामने आई तो इस सीन को फिल्म से काट दिया गया था. आजतक ने जब शरद पोंकसे से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, "हां नाटक से जुड़ा दृश्य इस फिल्म के लिए शूट तो किया गया था. लेकिन रिलीज के वक्त मुझे निर्देशक प्रवीण तारडे द्वारा बताया गया कि मूवी थोड़ी लंबी हो गई थी इसलिए उस सीन को काटना पड़ा." उन्होंने आगे कहा कि अब उनसे ये कहा जा रहा है कि इसी दृश्य को इस फिल्म के सीक्वल में जोड़ा जाएगा, जिसकी शूटिंग जल्द ही शुरू होगी. सूत्र बताते हैं कि इस सीन को शिवसेना के सीनियर लीडर के निर्देश पर हटाया गया था. इस नेता का मानना था कि ये सीन महा विकास अघाड़ी के दूसरे पार्टनरों के गले नहीं उतरती. 

बता दें कि एकनाथ शिंदे जब से मुख्यमंत्री बने हैं वे अपने भाषणों में सावरकर का खूब जिक्र कर रहे हैं. यहां तक कि मुख्यमंत्री बनने के बाद शिंदे शिवाजी पार्क में मौजूद सावरकर स्मारक भी पहुंचे थे. 

फिल्म में दिघे बाला साहेब के खिलाफ खुलकर जाते दिख रहे हैं

आनंद दिघे को इस फिल्म में एक कट्टर शिवसैनिक के रूप में दिखाया गया है. लेकिन इस मूवी में यह भी दिखाया गया है कि दिघे कई बार कुछ मुद्दों पर अपने बॉस बाला साहेब से खिलाफ चले जाते थे. इस फिल्म के एक सीन में दिखाया गया है कि शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब एमडी जोशी को मजबूरन विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार करते हैं, क्योंकि ये नाम आनंद दिघे द्वारा दिया गया था. शायद उद्धव इस फिल्म में छिपे इस संदेश को नहीं समझ पाए कि बाला साहेब से बगावत करने का सीन दिखाकर क्या मैसेज देने की कोशिश की जा रही है? 

संजय राउत: निशाने पर रहने वाला व्यक्ति

आनंद दिघे की जिंदगी का सबसे विवादित चैप्टर में से एक वो मामला था जब शिवसेना के पार्षद श्रीधर खोपकर की हत्या हुई थी. तब दिघे की एक प्रतिक्रिया ने उन्हें मु्श्किल में डाल दिया था. उन्होंने कहा था कि गद्दारों को छोड़ा नहीं जाएगा. बता दें कि ठाणे में मेयर के लिए हुए चुनाव के दौरान खोपकर ने कांग्रेस कैंडिडेट के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी. इस वजह से शिवसेना के उम्मीवार की हार हो गई थी. कहा जाता है कि ये संजय राउत ही थे जो तब एक मराठी साप्ताहिक में काम करते थे, उन्होंने दिघे के इस बयान को बढ-चढ़ कर छापा था. इस फिल्म में एक ऐसा ही 'रिपोर्टर' किरदार है जो पहनावे और चाल-ढाल में उन्हीं के जैसा लगता है. सिर्फ यही नहीं इस फिल्म के अंतिम सीन में ये रिपोर्टर दिघे की मौत पर शक भी जाहिर करता दिखाई देता है. बता दें कि शिंदे और उनकी मंडली संजय राउत पर लगातार हमले कर रही है और ये कह रही है कि विधायकों के बीच पनपे असंतोष की एक मुख्य वजह वह भी हैं. 

राज ठाकरे: हिन्दुत्व के उद्धारक 

अब बात फिल्म के क्लाइमैक्स की, आनंद दिघे मृत्य शय्या पर पड़े हैं, तभी राज ठाकरे उनसे मिलने आते हैं. दिघे राज ठाकरे से कहते हैं कि तुम हिन्दुत्व के भविष्य हो. यहीं पर उद्धव ठाकरे का किरदार फिल्म के अंत में कोई संवाद नहीं करता है. यहां ये बताना जरूरी है कि इस फिल्म के स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान इस सीन को देखने के बाद उद्धव ठाकरे थियेटर से बाहर आ गए थे. तब उद्धव ने कहा था, "मैं दिघे को मृत्यु शय्या पर देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका."
  
मजेदार बात यह है कि शिंदे बगावत के बाद यहां तक कि सीएम पद की शपथ लेने के बाद विशेषकर राज ठाकरे को कॉल कर रहे हैं. चर्चा यह भी है कि अगर शिंदे गुट को अपनी पार्टी विलय करने की जरूरत पड़ती है तो राज ठाकरे का एमएनएस उनके सामने एक विकल्प है.   

आखिर में, हालांकि शिंदे इस फिल्म के आधिकारिक प्रोड्यूसर नहीं है लेकिन वे लगातार इस फिल्म को प्रमोट करते रहे. फिल्म में दिखाया गया छिपा संदेश अब न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि बड़े पैमाने पर जनता में भी चर्चा का विषय बन गया है. आजतक को सूत्रों ने यह भी बताया है कि फिल्म के निर्माता पहले ही एक सीक्वल की योजना बना चुके हैं. 

 

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