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'भाई का केस प्रतिशोध से प्रेरित...', हाईकोर्ट ने बहन की सास और पति के खिलाफ FIR रद्द की

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और प्रवीण एस. पाटिल की खंडपीठ पुणे निवासी 68 वर्षीय महिला और उनके बेटे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने नागपुर में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी. यह एफआईआर उनकी बहू के भाई द्वारा दर्ज की गई थी.

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने के आदेश दिए (प्रतीकात्मक तस्वीर)
बॉम्बे हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने के आदेश दिए (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक महिला के भाई द्वारा उसकी सास और पति के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि यह शिकायत किसी वैध शिकायत के बजाय प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर दर्ज की गई थी.

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और प्रवीण एस. पाटिल की खंडपीठ पुणे निवासी 68 वर्षीय महिला और उनके बेटे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने नागपुर में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी. यह एफआईआर उनकी बहू के भाई द्वारा दर्ज की गई थी.

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील योगेश वैद्य ने बताया कि एफआईआर 11 फरवरी 2021 को महिला के भाई द्वारा दर्ज करवाई गई थी. इसमें कहा गया कि महिला की शादी जून 2016 में हुई थी और कुछ समय तक सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन फिर लगातार सोने के गहनों की मांग की जाने लगी. ये मांगें समय-समय पर महिला के परिवार द्वारा पूरी की जाती रहीं.

एफआईआर में कहा गया कि 12 जुलाई 2019 को महिला स्वास्थ्य समस्याओं के चलते अपने भाई के पास रहने आ गई. उसी समय के आसपास उसमें कैंसर का पता चला और उसका इलाज उसके भाई ने करवाया. जब महिला ठीक होकर 25 जनवरी 2020 को अपने पति के घर लौटी, तो कथित रूप से उससे कहा गया कि ₹8 लाख लेकर आओ, वरना घर में घुसने नहीं देंगे.

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हालांकि, वकील वैद्य ने तर्क दिया कि यह एफआईआर महिला के भाई द्वारा सिर्फ इसलिए की गई थी ताकि वह अपनी बहन के इलाज पर खर्च हुए पैसे वसूल सके. उन्होंने यह भी बताया कि महिला की मृत्यु एफआईआर दर्ज करने के ठीक अगले दिन यानी 12 फरवरी 2021 को हो गई थी.

वहीं, महिला के भाई ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पति और सास ने बीमारी के दौरान उसकी बहन की देखभाल नहीं की और जब वह घर लौटी तो ₹8 लाख की मांग की गई, इसलिए एफआईआर दर्ज की गई थी.

हालांकि, कोर्ट ने पाया कि महिला के पति ने ₹1.75 लाख इलाज में खर्च किए थे और वह अपनी पत्नी की बीमारी के दौरान उससे मिलने भी आता था. साथ ही उसने एक मेडिकल पॉलिसी भी देने की बात कही थी.

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत महिला के अपने बयान पर आधारित नहीं है, बल्कि उसके भाई द्वारा दर्ज करवाई गई है और जांच अधिकारी ने महिला के जीवित रहते हुए उसका बयान दर्ज नहीं किया था.

अंत में कोर्ट ने कहा कि आरोप भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत अपराध की पूर्व-शर्तों को पूरा नहीं करते हैं. कोर्ट ने कहा, “आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं, जबकि इस धारा के तहत सटीक समय, तारीख, स्थान और उत्पीड़न की प्रकृति स्पष्ट होनी चाहिए."

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धारा 498A के तहत पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता के मामलों की जांच की जाती है.

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