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मध्य प्रदेश: देश को मिला दूसरा 'माउंटेन मैन', पहाड़ खोदकर बनाया रास्ता

आपने दशरथ मांझी का नाम सुना होगा. बिहार के गया में उन्होंने अकेले पूरा पहाड़ काटकर सड़क बना दी थी. देश उन्हें 'माउंटेन मैन' के नाम से जानता है. लेकिन अब देश को एक और 'माउंटेन मैन' मिल गया है.

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Mountain man in Madhya Pradesh
Mountain man in Madhya Pradesh

आपने दशरथ मांझी का नाम सुना होगा. बिहार के गया में उन्होंने अकेले पूरा पहाड़ काटकर सड़क बना दी थी. देश उन्हें 'माउंटेन मैन' के नाम से जानता है. लेकिन अब देश को एक और 'माउंटेन मैन' मिल गया है. जज्बे और साहस की यह कहानी है आदिवासी समाज से आने वाले 50 साल के ज्ञान सिंह की. उन्होंने भी पहाड़ियों की पगडंडी को अपनी बेशकीमती मेहनत से चौड़े रास्ते में बदल दिया. पहले वहां से साइकिल भी बमुश्किल निकलती थी, अब ढाई किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर ट्रैक्टर भी आसानी से जा सकता है.

बड़वानी जिले के गोमडिया खुर्द गांव में तीन साल पहले यह रास्ता बनाने की शुरुआत ज्ञान सिंह ने अकेले की थी. बाद में पूरा गांव उनके साथ जुड़ा और सबने मिल-जुलकर यह रास्ता बनाया. जो गांव कभी ज्ञान सिंह को सिरफिरा समझता था, वह आज उन पर गर्व कर रहा है.

इस घटना ने दी ज्ञान को प्रेरणा
क्या आप जानते हैं कि वह कौन सी बात थी जिसने ज्ञान सिंह को पहाड़ पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए प्रेरित किया. पहाड़ पर रास्ता न होने के चलते लोगों के खेतों तक बैलगाड़ी भी नहीं पहुंच पाती थी. एक दिन ज्ञान सिंह के पेट में बैल ने सींग मार दिए. उनकी हालत नाजुक थी, लेकिन रास्ता न होने से उन्हें अस्पताल ले जाना मुश्किल हो गया. लोग जैसे-तैसे उसे चादर में लपेटकर लोग कंधे पर उठाकर ले गए. किस्मत ने साथ दिया और ज्ञान सिंह की जान बच गई. लेकिन इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि कम से कम इतनी चौड़ी सड़क गांव तक बन जाए कि मोटर कार भी वहां तक आ सके. उसने अपनी पत्नी को इरादा बताया तो वह भी साथ देने को तैयार हो गईं. दोनों पति-पत्नी जब अपने दम पर पहाड़ काटकर रास्ता बनाने निकल पड़े तो पहले तो लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ाई. लेकिन जब लोगों को लगा कि यह काम संभव है तो धीरे-धीरे वे भी इससे जुड़ते चले गए.

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ज्ञान सिंह बताते हैं, 'तकरीबन एक साल तक सिर्फ मैंने और मेरी पत्नी ने साथ काम किया. सड़क बनती देखकर गांव के लोग साथ हो गए और तीन साल में यह ढाई किलोमीटर की यह सड़क बन पाई.'

 

अब एंबुलेंस भी आ सकती है गांव
इस काम में एक एनजीओ जन अभियान परिषद ने भी अहम भूमिका निभाई. एनजीओ ने पूरे गांव को एकजुट कर सहयोग के लिए तैयार किया. गांव के रहने वाले राधेश्याम बताते हैं, 'शुरू में हमें नहीं लगता था कि सड़क बन पाएगी. हमने ज्ञान सिंह को शुरू में मना किया था. सड़क बनती देख हम भी उसके साथ हो लिए. इससे पहले हमने कई बार सड़क की मांग की थीस, पर पूरी नहीं हुई.'

सड़क बनने के बाद अब न केवल बैलगाड़ी, ट्रैक्टर और ट्रॉली खेतों तक जा सकते हैं, बल्कि इमरजेंसी की हालत में एंबुलेंस का आना भी संभव हो गया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रशासन की ओर से मदद तो दूर, ज्ञान सिंह के लिए शाबासी का एक संदेश भी नहीं आया.

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