मध्य प्रदेश के कई जिलों में कुपोषण से बच्चों के मरने की खबरें आ रही हैं. इसकी शुरुआत राज्य के उत्तरी हिस्से श्योपुर और मुरैना से हुई थी. लेकिन अब राज्य के सूदूर दक्षिणी हिस्सों से भी कुपोषण की खबरें सामने आ रही हैं.
ताजा मामला मध्य प्रदेश के निमाड़ में पड़ने वाले खंडवा जिले का है, जहां का खालवा क्षेत्र इन दिनों कुपोषण से जूझ रहा है. हालात ये हैं कि गांव में बच्चों की कुल आबादी का आधा हिस्सा कुपोषित है. यहां के आवल्या नागौतार गांव में तो पांच साल से कम उम्र के लगभग 250 बच्चों का वजन 5 किलो से भी कम है.
पत्ते और लहसुन की माला से इलाज
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर यहां के अधिकतर बच्चे खरे नहीं उतरते. लेकिन विडंबना देखिए कि जिस इलाके में बड़ी तादाद में कुपोषित बच्चे हैं, वहां उनके अभिभावक अस्पतालों में उनका इलाज ना करावकर उन्हें पीपल के पत्ते और लहसुन की माला पहनाकर उनके स्वस्थ होने का इंतजार कर रहे हैं. यहां किसी बच्चे के गले में सूत का नाड़ा डला हुआ है तो किसी ने लोहे का तार गले में डाल रखा है. अस्पताल में इलाज नहीं मिलने के कारण दम तोड़ते बच्चों को बचाने के लिए गांव के लोग अब इन्हीं अन्धविश्वास के सहारे हैं. इन लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच नहीं है.
सिर्फ एक एमबीबीएम डॉक्टर के भरोसे 167 गांव
इस पूरे खालवा क्षेत्र में 86 पंचायते हैं और 167 गांव. दिलचस्प है कि इनके बीच सिर्फ एक एमबीबीएस डॉक्टर है जो खालवा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ है. इसके अलावा इस क्षेत्र में सिर्फ दो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रौशनी और सेंधवाल में हैं. ये स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ एक-एक नर्स के भरोसे हैं. ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत समझी जा सकती है. दूसरी तरफ, गांव की बड़ी आबादी के बिमारियों के प्रति जागरूक नहीं है. आदिवासी बहुल इलाका होने के कारण ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं और घरेलू नुस्खों से ही बिमारी को काबू में करने की कोशिश में रहते हैं.
हालांकि, लगातार उठ रहे सवालों को देखते हुए अब सरकार भी जागी है और जिलों से निकल कर स्वास्थ्य विभाग की टीमें अब उन गांवों तक पहुंच रही है, जहां कुपोषित बच्चे मिल रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग की टीमें ना केवल लोगों को जागरूक कर रही हैं, बल्कि कुपोषित बच्चों को अस्पताल पहुंचाने का काम भी कर रही है.