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जंगल और विकास, दोनों साथ-साथ के हिमायती रहे हैं शिबू सोरेन

झारखंड में हमेशा से आदिवासी समाज के लोग इस बात से दुखी रहे हैं कि उनसे विकास के नाम पर जमीन-जंगल ले तो लिया गया, लेकिन उनके पुनर्स्थापन तक की व्यवस्था नहीं की गई.

आज के दौर के नेताओं से अलग हैं शिबू सोरेन (फाइल फोटो) आज के दौर के नेताओं से अलग हैं शिबू सोरेन (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • जंगल को लेकर आदिवासी समाज का रहा है झगड़ा
  • विकास के नाम पर ली जाती है जमीन-जंगल
  • बाद में पुनर्स्थापन या रोजगार की नहीं होती व्यवस्था

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन ने सोमवार को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली. एक आम आदिवासी परिवार में जन्मे शिबू सोरेन का जीवन आदिवासी समाज की दिक्कतों, उनकी अपने हक के लिए लामबंदी और संघर्ष तथा विकास की मुख्यधारा की ओर उनकी यात्रा की कहानी है. जंगल को लेकर आदिवासी समाज और उद्योगपतियों के बीच हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. शिबू सोरेन भी उसी समाज से आते हैं. तो क्या वो भी प्रदेश में उद्योग लगाने के खिलाफ हैं?

इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग ने aajtak.in से बात करते हुए कहा कि लोगों के बीच ऐसी धारणा बना दी गई है. दरअसल झारखंड में हमेशा से आदिवासी समाज के लोग इस बात से दुखी रहे हैं कि उनसे विकास के नाम पर जमीन-जंगल ले तो लिया गया, लेकिन उनके पुनर्स्थापन तक की व्यवस्था नहीं की गई. ना ही उन्हें उचित मुआवजा ही मिला. कई जगह तो आदिवासी समाज के लोगों को कोई मुआवजा मिला ही नहीं. इन सभी बातों को लेकर लोगों में काफी आक्रोश रहा है कि हमारी जमीन भी जा रही है, हमारा पर्यावरण भी जा रहा है. हमारा जंगल भी जा रहा है. लेकिन हासिल कुछ भी नहीं हो रहा है. हालांकि शिबू सोरेन इस तरह से नहीं सोचते हैं. उनका मानना है कि जंगल और विकास दोनों चाहिए.

लघु और मझोले उद्योग स्थापित करने पर रहा जोर

शिबू सोरेन शुरुआत से ही चाहते थे कि प्रकृति का संरक्षण भी हो और लघु और मझोले उद्योग भी स्थापित हों. जरूरत हो तो बड़े उद्योग भी. हालांकि सोरेन, छोटे और मझोले उद्योग को बढ़ावा देने की बात ज्यादा करते हैं. वो मानते हैं कि इससे आदिवासी समुदाय को ज्यादा फायदा मिलेगा. वो किसी भी उद्योग के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन उनका मानना है कि उद्योग आने के बाद प्रकृति को नष्ट ना किया जाए. वो हमेशा एक बैलेंस बनाने की कोशिश करते हैं. सोरेन अक्सर कहते हैं कि हमलोग विकास विरोधी नहीं हैं लेकिन विकास किस कीमत पर यह जरूर बताया जाना चाहिए. इसके साथ ही जिसकी जमीन ली जा रही है उसे भी मालिक की हैसियत मिलनी चाहिए. एक उजड़े हुए व्यक्ति की तरह नहीं रहेंगे लोग.

शिबू सोरेन का जोर लघु उद्योग और मझोले उद्योग पर इसलिए ज्यादा रहा, क्योंकि इसमें विस्थापन की समस्या नहीं आती है. लोगों को रोजगार मिलता है और लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है. वो मानते हैं कि इन उद्योगों से झारखंड का बेहतर विकास हो सकता है. सिन्हो कानू और बिरसा मुंडा के पथ पर आगे चलते हुए उन्होंने हमेशा मनुष्य और प्रकृति को साथ रखने पर जोर दिया. शिबू सोरेन कृषि आधारित उद्योग को बढ़ावा देने की बात करते हैं.

ये तीन गुण आज के नेताओं में नहीं

वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग बताते हैं कि बुनियादी रूप से देखें तो शिबू सोरेन में तीन ऐसे गुण हैं जो आज के नेताओं में देखने को नहीं मिलते. पहला तो अगर उनसे कोई गलती भी होती है तो वो स्वीकार करते हैं. कभी बात पलटने की कोशिश या सवालों से नहीं बचते.  'एक बार वो एक गेस्ट हाउस में सोफे पर एसी के सामने बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप पहले वाले गुरुजी क्यों नहीं रह गए? उन्होंने कहा कि जो एसी के चक्कर में सोफा में धंस गया, वो कुछ नहीं कर सकता. इसलिए अभी भी मैं पैदल चलता हूं और जमीन पर सोता हूं, ताकि मेरी वो आत्मा नहीं मरे. उनके अंदर स्वीकार करने की ताकत है जो हमने किसी और नेता में नहीं देखा है. अगर कोई उनकी गलती की ओर ध्यान दिलाता है तो वो सार्वजनिक जीवन में भी उसे स्वीकार कर लेते हैं कि आप ठीक कह रहे हैं, मुझसे गलती हुई.

1993 सांसद घूसकांड पर क्या बोले शिबू सोरेन

एक पुरानी बातचीत को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि 1993 सांसद घूसकांड वाली घटना को याद करते हुए शिबू सोरेन ने कहा था कि अगर हमलोग इतने चालाक होते तो सिर्फ 30 लाख रुपये के लिए फंस जाते? किसने मेरे अकाउंट में पैसा डाला मुझे यह भी नहीं पता. किसी शख्स ने अकाउंट नंबर पूछा हमने बता दिया. ये बात सही है कि मैंने पीवी नरसिम्हा राव को सपोर्ट किया था. लेकिन पैसे वाले प्रकरण में मैं शामिल नहीं हूं. मेरे अकाउंट में किसने पैसे डाले मुझे नहीं पता.

वो हमेशा अपने लोगों की भीड़ में घिरे रहते हैं और उनसे संथाली भाषा में ही बातें करते हैं. भाषा और अपने लोगों के बीच में रहने की वजह से वो ताकत अर्जित कर लेते हैं. जो आज के नेताओं में कम देखने को मिलता है. बाहर निकलते हुए वे कभी अपने लुक्स की परवाह नहीं करते हैं. दाढ़ी बढ़ी हुई, बिना इस्तरी किए कपड़े और चप्पल पहनकर लोगों के बीच निकल जाते हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों में उन्होंने इस्तरी किए हुए कपड़े पहनने शुरू किए हैं. वो एक बहुत अच्छे वक्ता हैं और लोगों से जुड़ना जानते हैं.

स्त्री का अपमान नहीं करते बर्दाश्त

वे ना तो शराब पीते हैं और ना ही किसी स्त्री का अपमान बर्दाश्त करते हैं. अगर किसी शख्स के बारे में उन्हें पता चल जाए कि उसने किसी लड़की के साथ छेड़-छाड़ की है तो वो उसके साथ काफी बेरहमी से पेश आते हैं.

एक घटना का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग कहते हैं कि शिबू सोरेन एक बार दुमका में एक कार्यक्रम का समापन कर धनबाद लौट रहे थे. उन्हें इतनी जल्दी थी कि उन्होंने रास्ते में रुककर ना तो खाना खाया और ना चाय पी. लेकिन अचानक बीच रास्ते में उनकी गाड़ी रुक गई. शिबू सोरेन एक गांव के अंदर पहुंचे. उनके लिए खाट बिछाई गई. पता चला कि लड़की के साथ छेड़खानी का मामला है. उन्होंने वहीं पर अदालत शुरू कर दी और फैसला सुनाकर ही वहां से रवाना हुए. हालांकि इस अदालत की वजह से उन्हें पहुंचने में 5-6 घंटे की देरी हो गई.

 

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