गांव-गांव तक विकास की रौशनी फैलाने के बड़े-बड़े दावे करने वाली केंद्र और राज्य की सरकार का सच पलामू और लातेहार जिलों में दिखाई देता है, जहां मोबाइल और लैपटॉप तो लोगों के हाथों में आ गए हैं, लेकिन कनेक्टिविटी के लिए या तो ऊंचे पहाड़ी टीलों पर जाना पड़ता है या फिर किसी पेड़ पर.
लातेहार जिले के कुछ गावों के लोगों को कनेक्टिविटी के लिए पेड़ पर चढ़कर बैठना होता हैं. वहीं गढ़वा जिले के एक गांव में तो लोग नेटवर्क पाने के लिए अपने मोबाइल फोन को पेड़ों पर बांधकर लटका देते हैं. दरअसल, मोबाइल क्रांति के इस दौर में भी इन ग्रामीण इलाकों के लोग नेटवर्क की समस्या से दो-चार हैं. ये दृश्य झारखंड सरकार के डिजिटल होने के सरकारी दावों की पोल खोलते है.

सुदूर इलाकों में नेटवर्क के लिए पेड़ों पर चढ़ते हैं लोग
ये नजारा है लातेहार जिले के सरयू गांव का, जहां लोग डिजिटल इंडिया से जुड़ने की तैयारी कर रहे हैं, अब जरा इन दृश्यों को ध्यान से देखिये. आखिर अपने हाथों में लैपटॉप लेकर ये पेड़ पर क्यों चढ़ रहे हैं. पेड़ पर चढ़ना इनकी मजबूरी है. क्योंकि जमीन पर इन्हें नेटवर्क यानी वाइफाई कनेक्शन नहीं मिल पाता.
ऐसे में जरूरी कामों को निपटाने के लिए ये पेड़ों का सहारा लेते हैं. इनमें छात्रों से लेकर ग्रामीण बैंक के कर्मी तक शामिल है. इतना ही नहीं OTP के लिए ये अपने मोबाइल फोन्स को रस्सी के सहारे सबसे ऊंचाई वाले पेड़ की शाखाओं में लटकाते हैं. ताकि OTP मिल सके.
दरअसल, नौकरी के लिए आवेदन, पास बुक अपडेट से लेकर ऑनलाइन मनरेगा भुगतान, आधार कार्ड से जुड़ी समस्याओं का निदान इन दिनों ऑनलाइन होने के बाद ही हो पाता है. कभी घोर नक्सल प्रभावित रहे इस क्षेत्र में सरयू एक्सन प्लान के तहत सरकार ने 400 करोड़ रुपये लागत से योजनाओं को धरातल पर उतारने का लक्ष्य रखा था. लेकिन आज सरकारी योजनाएं तो दूर लोगों को दूर रिश्तेदारों से बात करना भी दूभर है.
पेड़ पर मोबाइल लटकता मिलेगा
गढ़वा जिले के बड़गढ़ इलाके में एक ऐसा पेड़ है, जिस पर आपको कोई फल नहीं, बल्कि मोबाइल लटकता मिलेगा. जिन्हें इस इलाके के ग्रामीणों ने नेटवर्क पाने की तलाश में यहां लटकाया है. दरअसल, बड़गढ़ का यह इलाका गढ़वा जिला मुख्यालय से लगभग सत्तर किलोमीटर की दूरी पर झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर है. यहां मोबाइल कनेक्टिविटि लगभग जीरो है.
यहां के ग्रामीणों को जब बातें करनी होती है तो लोग इस पेड़ के पास चले आते हैं. वहीं जब किसी का फोन आना होता है तो वे अपना फोन इस पेड़ में बांध देते हैं. बांधने के बाद या तो लोग वहीं बैठ फोन आने का इंतजार करते हैं या फिर घर को लौट जाते हैं. फोन आने के बाद बुलावे पर वे फिर पेड़ के पास आ जाते हैं. यहां के लोगों की अजब मजबूरी है. ये रहते तो झारखंड में हैं पर जिस नेटवर्क को पाने के लिए वे मोबाइल को पेड़ से बांधते हैं उसमें नेटवर्क आता भी है तो वह पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का है.
सरकारी वादों की पोल खुली
यहां एक तरफ दशकों से नेटवर्क से बाहर रहते हुए नेटवर्क क्षेत्र में आने की बाट जोहते लोग है, वहीं दूसरी तरफ आश्वासन के जरिये लोगों को जल्द नेटवर्क एरिया में ले लाने का ख्वाब दिखाते जनप्रतिनिधि. अब देखने वाली बात होगी कि कब तक इस इलाके में मोबाइल नेटवर्क काम करना शुरू करता है ताकि लोगों को नेटवर्क की सुविधा के लिए पेड़ पर न चढ़ना पड़े. जब मुख्यमंत्री से इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी भी योजना के लागू होने पर कुछ दिक्कतें आती है. इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार से बात हुई है और जल्द इस पर कार्रवाई होगी.