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रांची: पक्की नौकरी के लिए सहायक पुलिसकर्मियों का प्रदर्शन, बवाल बढ़ने पर लाठी चार्ज

विरोध प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि उन्हें तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. इतने से भी बात नहीं बनी तो आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. संविदा पर काम कर रहे सहायक पुलिसकर्मियों से वादा किया गया था कि तीन साल बाद उनकी नौकरी पक्की कर दी जाएगी.

संविदा कर्मियों पर लाठी बरसाते पुलिसकर्मी (PTI) संविदा कर्मियों पर लाठी बरसाते पुलिसकर्मी (PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • संविदा पर रखे गए थे 2500 सहायक पुलिसकर्मी
  • तीन साल बाद नौकरी पक्की होने का मिला था आश्वासन
  • अगस्त 2020 के बाद से रिन्यू नहीं हुआ कॉन्ट्रैक्ट

सरकारी नौकरी में संविदा को लेकर यूपी में बीजेपी विधायक अपने ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रही है. वहीं झारखंड में 2500 सहायक पुलिसकर्मियों को कंफर्म करने की मांग को लेकर शुक्रवार को पुलिस के साथ रांची में झड़प देखने को मिली. विरोध प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि उन्हें तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. इतने से भी बात नहीं बनी तो आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. ये सभी सहायक पुलिसकर्मी 12 सितंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं. 

इनकी मांग है कि 2017 में जिन 2500 सहायक पुलिसकर्मियों को संविदा पर भर्ती किया गया था, उन्हें कंफर्म किया जाए. उन्हें आश्वासन दिया गया था कि तीन साल तक अगर उनका प्रदर्शन अच्छा रहा तो उनकी नौकरी पक्की कर दी जाएगी. लेकिन अगस्त 2020 के बाद से उनका कॉन्ट्रैक्ट भी रिन्यू नहीं किया गया है. इसी बात से नाराज प्रदेश भर के सहायक पुलिसकर्मी रांची के मोरादाबादी मैदान में जमा हुए हैं. 

एसएसपी और एसपी ने कोविड महामारी का हवाला देते हुए जिले के सहायक पुलिसकर्मियों को समझाया और मैदान छोड़ने को कहा. इसके बावजूद बात नहीं बनी. तल्खी इतनी बढ़ गई कि एक तरफ से पत्थरबाजी शुरू हो गई, जिसके बाद पुलिस को उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी पड़ी. 

इससे पहले रघुबर दास सरकार में इनसे वादा किया गया था कि अगर तीन साल तक कामकाज में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा तो उनकी नौकरी पक्की कर दी जाएगी. आंदोलन के दौरान महिला सहायक पुलिसकर्मी भी मौजूद थीं. ये रांची में बारिश और धूप की तपिश के बीच डेरा डाले हुए हैं. उनका कहना है कि अगर उनकी नौकरी पक्की नहीं हुई तो उन्हें अपने घर लौटना होगा. इसके बाद माओवादी उन्हें उठा लेंगे क्योंकि वो उनके खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी ऑपरेशन में शामिल रहे हैं. 

आंदोलन में शामिल सभी सहायक पुलिसकर्मियों को इस बात की चिंता सता रही है कि अगर उनकी नौकरी गई तो या तो उन्हें नक्सलियों के गुट में शामिल होना पड़ेगा या उनकी जान जाएगी. सहायक पुलिस कर्मियों को डर है कि कहीं पुलिस के भेद जानने के लिए नक्सली उनका अपहरण न कर लें. इन सभी बातों को लेकर ये लोग काफी डरे हुए हैं.    

 

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